हमेशा जुकाम रहता है ,करें ये उपचार

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सायनस के उपचार 

नाक हमारे शरीर की पांच इंद्रियों में से एक है। सांस लेने में रुकावट, नाक की हड्डी का बढ़ना और तिरछा होना, साइनस भरना और एलर्जी होना इसकी आम समस्या है।  साइनस के संक्रमण का कारण साइनस की झिल्ली में सूजन आना है। साइनस के कारण हवा की जगह में मवाद या बलगम भर जाता है, जिससे साइनस बंद हो जाते हैं। इस वजह से सिर में, गालों व ऊपर के जबड़े में दर्द होने लगता है।

साइनस हमारी खोपड़ी में भरी हुई कैविटी होती है, जो हमारे सिर को हल्का बनाए रखने और सांस लेने में मदद करती है। हमारी सांस इस थैली से होकर फेफड़ों तक जाती है। इस थैली में हवा के साथ आने वाली गंदगी यानी धूल और दूसरे प्रकार की गंदगियां रोक ली जाती हैं और बाहर फेंक दी जाती हैं। जब साइनस का रास्ता रुक जाता है यानी बलगम बाहर निकलने का रास्ता रुकता है तो साइनोसाइटिस नाम की बीमारी का खतरा पैदा हो जाता है। इस कारण आपकी ऊर्जा में कमी आती है, नींद पर बुरा असर पड़ता है। आपकी सूंघने और स्वाद की शक्ति कमजोर हो जाती है और सांस लेने में भी तकलीफ होती है।

साइनस की बीमारी एक सामान्य बीमारी है जो संक्रमण या एलर्जी से होती है। इस बीमारी में नाक बंद होने से सांस लेने में तकलीफ होती है लेकिन ज्यादातर लोगों को नहीं पता कि नमी वातावरण में यह परेशानी बढ़ सकती है।

साइनोसाइटिस हो सकता है अगर
आवाज में बदलाव है
सिर में दर्द और भारीपन रहता है
नाक और गले में बलगम रहता है
हल्का बुखार रहता है
दांतों में दर्द रहता है
तनाव से परेशान रहते हैं
चेहरे पर सूजन आ जाती है
नाक से पीले रंग का द्रव गिरने की शिकायत रहती है

कैसे बचें साइनस से

साइनस मानव शरीर की खोपड़ी में हवा भरी हुई कैविटी होती हैं, जो हमारे सिर को हल्कापन और सांस वाली हवा को नमी युक्त करती है.

किसी भी संक्रमण से हुए सर्दी, जुकाम के लंबे समय तक रहने से साइनस की तकलीफ हो सकती है. चेहरे की हड्डियों की खाली जगह को साइनस कहते हैं.

साइनस की चपट में आने से सिरदर्द की परेशानी रहती है. परंतु सारे सिरदर्द का कारण साइनस ही नहीं होते है. कई बार दर्द का कारण माइग्रेन और तनाव भी हो सकता है.

घरेलु उपाय:

स्टीमर या भाप

अगर नाक में ब्लॉकेज है, तो भाप लें. भाप लेते वक्त पंखा, कूलर और एसी बंद कर लें. सिर पर कपड़ा ढककर नाक और मुंह से सांस भरते हुए 8-10 मिनट तक भाप लें. भाप लेने के बाद 20 मिनट तक हवा में न जाएं.

सिकाई

गर्म कपड़ा या फिर गर्म पानी की बोतल गाले के ऊपर रखकर सिकाई करनी चाहिए. इससे काफी आराम मिलता है.

प्याज और लहसुन

अगर आपको साइनर है तो प्याज और लहसुन बेहद फायदेमंद रहेगा. इसे अपने भोजन में शामिल करें. साथ ही इसे कच्चा भी खा सकते हैं.

गाजर का जूस

गाजर का जूस साइनस के इलाज में मदद करेगा. इसमें चुकंदर, पालक या खीरे का रस भी मिक्स कर सकते हैं.

साइनस का ठीक वक्त पर इलाज नहीं कराने से धीरे-धीरे ये माइग्रेन में तब्दील हो जाता है. इस बीमारी से ज्यादातर महिलाओं प्रभावित होती है. इसके इलाज के लिए शुरुआत में डॉक्टर दवाइयों की मदद लेते हैं, लेकिन बीमारी ज्यादा बढ़ जाने पर सर्जरी करवानी पड़ती है.

बंद नाक को खोलने के लिए कुछ रामबाण घरेलु नुस्‍खे
1. अगर जुकाम में नाक बंद हो  तो 10 ग्राम अजवायन को एक साफ कपड़े की पोटली में बांध कर तवे पर गर्म कर लें। फिर इसे बार-बार सूंघने से जुकाम में आराम होता है, बंद नाक खुल जाती है, गंदा पानी निकल जाता है व सिर का भारीपन मिट जाता है।

2. गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद ,आधा चम्मच नींबू का रस को कुछ महीनों तक लगातार लें इससे आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में संतुलन आ जाएगा और आपको एलर्जी से सम्बंधित परेशानियों में अवश्य ही लाभ मिलेगा।

3. केवल दो से  तीन बूँद लहसुन का रस अपने नाक में टपकायें यह बंद नाक खोलने का एक सरल घरेलु उपाय है।

4. और अन्‍त में मुझे लगता है कि कलौंजी का तेल जिसमें मौत के अलावा तमाम रोगों का छुटकारा है नाक के अन्‍दर और बाहर मलें |जरूर फायदा होगा 

मुंह से नाक का काम न लिया जाए जैंसा कि अक्‍सर लोग सांस लेने का काम मुंह से करते हैं क्‍योंकि यह बहुत बड़ी बिमारी को बुलावा है। नाक अंगर बंद है तो सुबह एक तरफ की नाक के छेद को बंद करके सांस ले और दूसरे नाक के छेद से छोड़ें इसी तरह दूसरी तरफ भी करें और लम्‍बा-लम्‍बा सांस लें और छोड़ें। 

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मिट्टी के प्रयोग से कष्टसाध्य रोगों की चिकित्सा

सर्वाधरे सर्व बीजे सवशक्ति समन्विते ।

सर्वकाम प्रदे देवि सर्वेष्टं देहि में धरे ।। ( ब्रह्मवैवर्त पुराण )

अर्थात: हे पृथ्वी देवी! आप सबको धारण करने वाली हो, सर्वबीजमयी हो, सर्वशक्ति सम्पन्न हो, सर्वकामप्रदायिनी हो, प्रकाशमयी हो, देवी! आप हमारे मनोरथों को सिद्ध करो।

इस ब्रह्माण्ड में पांच तत्व-पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश व्याप्त है। पृथ्वी पंचतत्वों में पांचवा और अन्तिम तत्व है| पृथ्वी तत्व अन्य चार तत्वों का रस है। हमारा शरीर भी इन्ही पंचतत्वों से बना है। अप्राकृतिक आहार विहार और विचार से शरीर में इन पंचतत्वों का असंतुलन हो जाता है जिसके फलस्वरूप हम रोगी हो जाते हैं। प्रकृतिक चिकित्सा में इन्ही पंचतत्वों के माध्यम से शरीर को रोगमुक्त किया जाता है। पंचतत्व निर्मित मानव देह में पृथ्वी तत्व के गुण, लाभ एवं रोगमुक्ति में प्रयोग के विषय में जानकारी दे रहे हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैज्ञानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए मिट्टी-चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। मिट्टी, शरीर के दूषित पदार्थों को घोलकर व अवशोषित कर अंततः शरीर के बाहर निकाल देती है। मिट्टी की पट्टी एवं मिट्टी-स्नान इसके मुख्य उपचार हैं। मृदास्नान  (मड बाथ) रोगों से मुक्ति का अच्छा उपाय है।

विभिन्न रोगों जैसे कब्ज, स्नायु-दुर्बलता, तनावजन्य सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा विशेष रूप से सभी प्रकार के चर्म रोगों आदि में सफलतापूर्वक इसका उपयोग कर जीवन शक्ति का संचार एवं शरीर को कांतिमय बनाया जा सकता है। रोग चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, मिट्टी उसके विष और गर्मी को धीरे-धीरे चूसकर उस जड़-मूल से नष्ट करके ही दम लेगी। यह मिट्टी की खासियत है।

मिट्टी-स्नान के लिए जिस क्षेत्र में जैसी मिट्टी उपलब्ध हो, वही उपयुक्त है लेकिन प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफ-सुथरी, कंकर-पत्थर व रासायनिक खादरहित तथा जमीन से 4-5 फुट नीचे की होना चाहिए। एक बार उपयोग में लाई गई मिट्टी को दुबारा उपयोग में न लें। अगर मिट्टी बहुत ज्यादा चिपकने वाली हो तो उसमें थोड़ी-सी बालू रेत मिला लें। संक्रमण से ग्रस्त तथा अत्यधिक कमजोर व्यक्ति मिट्टी-स्नान न करें। ठंडे पानी से स्नान करने के पश्चात शरीर पर हल्का तेल मल लें।

सूखी मिट्टी स्नान : शुद्ध-साफ मिट्टी को कपड़े से छान लीजिए और उससे अंग-प्रत्यंग को रगड़िए। जब पूरा शरीर मिट्टी से रगड़ा जा चुका हो, तब 15-20 मिनट तक धूप में बैठ जाएं, तत्पश्चात ठंडे पानी से, नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लीजिए।

गीली मिट्टी स्नान : शुद्ध, साफ कपड़े से छनी हुई मिट्टी को रातभर पानी से गलाकर लेई (पेस्ट) जैसा बना लीजिए और पूरे शरीर पर लगाकर रगड़िए तथा धूप में 20-30 मिनट के लिए बैठ जाएं। जब मिट्टी पूरी तरह से सूख जाए तब ठंडे पानी से पूरे शरीर का नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लें।

किसी भी तरह की दुर्गन्ध को मिटाने के लिये मिट्टी से बढ़कर संसार मे अन्य कोई दुर्गन्धनाशक वस्तु नही है । मिट्टी में सर्दी और गर्मी रोकने की क्षमता है इसीलिए सर्दी-गर्मी दोनो मौसम में मिट्टी से बने घर अरामदायक सिद्ध होते हैं । इसी गुण के कारण यह विभिन्न रोगों में अपना अच्छा प्रभाव छोडती है। मिट्टी में विद्रावक शक्ति अचूक होती है । बडे से बडे फोडे़ पर मिट्टी की पट्टी चढ़ाने से, विद्रावक शक्ति के कारण वह उसे पकाकर निचोड़ देती है एवं घाव भी बहुत जल्दी भर देती है ।

मिट्टी मे विष को शोषित करने की विलक्षण शक्ति होती है। सांप, बिच्छू, कैंसर तक के जहर को खींचकर (सोखकर) कुछ ही दिनों में ठीक कर देती है। मिट्टी में जल को शुद्ध करने की शक्ति निहित है। जल शोधक कारखानों में गन्दे दूषित जल को मिट्टी के संयोग से कई चरणों में छानकर निर्मल एवं पीने योग्य बनाया जाता है।

मिट्टी में रोग दूर करने अपूर्व शक्ति है क्योंकि मिट्टी में जगत की समस्त वस्तुओं का एक साथ रासायनिक सम्मिश्रण सर्वाधिक विद्यमान है जबकि किसी एक दवा या कई दवाओं के मिक्सचर में उतना रासायनिक सम्मिश्रण सम्भव नही हो सकता। अग्नि, वायु, जल के वेग को रोकने की क्षमता मिट्टी में निहित हैं। मिट्टी में चूसने की शक्ति निहित है अतः वह शरीर से विष को चूस लेती है। शरीर की बहुत सारी पीड़ाएं तो मिट्टी के प्रयोग के कुछ ही क्षणों बाद शांत हो जाती हैं। सब्र संयम एवं विश्वास के साथ मिट्टी चिकित्सा की जाए तो जटिल रोग भी निश्चित ही चले जाते हैं।

मिट्टी के प्रयोग से बड़े से बड़ा घाव भी ठीक हो जाता है। रोग चाहें शरीर के बाहर हो या भीतर मिट्टी उसके विष एवं गर्मी को चूसकर उसे जड़ से नष्ट कर देती है।  पृथ्वी पर नंगे पैर चलने के लाभ: नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। नंगे पैर पृथ्वी के सम्पर्क में रहने से पैर मजबूत, स्वस्थ,सुडौल एवं रक्त संचरण बराबर होने से उनमे से गन्दगी एवं दुर्गन्ध निकल जाती है एवं बिबाई भी नहीं पड़ती। पाचन संस्थान सबल होता है एवं उच्च रक्तचाप व शरीर के बहुत सारे रोग आश्चर्यजनक रूप से दूर हो जाते हैं। सिरदर्द, गले की सूजन, जुकाम, पैरों और सिर का ठण्डा रहना आदि रोग दूर हो जाते हैं।

मृदास्नान  (मड बाथ) रोगों से मुक्ति

अप्राकृतिक आहार, अनियमित दिनचर्या एवं दूषित विचारों से जब शरीर में विजातीय द्रव्यों (विष) की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है तब इस विष को निकालने के लिए हमारे शरीर के प्रमुख मल निष्कासक अंग (त्वचा, आंत, फेफडे एवं गुर्दे) भी अक्षम हो जाते हैं। इस स्थिति में उक्त विष शरीर के अन्दर एकत्र होकर रोग पैदा करता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इस विष को मिट्टी,पानी,धूप,हवा और आकाश तत्वों की सहायता से विकसित उपचारों द्वारा शरीर का शोधन कर रोगमुक्त किया जाता है। मात्र पृथ्वी तत्व के कुछ प्रयोगों से भी शरीर का शोधन कर सकते हैं।

रज स्नान: विधिः- शुद्ध साफ मिट्टी को कपड़े से छानकर उसे सम्पूर्ण शरीर पर रगड़ने के पश्चात् 10- 20 मिनट धूप में बैठें, तत्पश्चात ताजे पानी से स्नान कर लें। त्वचा नरम, लचीली एवं कोमल हो जाती है। शरीर के रोमछिद्र खुल जाने से शरीर का विजातीय द्रव्य (विष) पसीने के माध्यम से बाहर निकल जाता है। त्वचा के समस्त रोग एवं बरसाती फोडे- फुंसियाँ इस स्नान से मंत्रवत दूर हो जाते हैं।

गीली मिट्टी स्नान: महीन पिसी हुई मिट्टी को पानी के साथ घोलकर लेई की तरह बना लें फिर उसका पूरे शरीर पर लेपन करें, तत्पश्चात धूप में बैठ जाएं। मिट्टी के सूख जाने के उपरान्त धीरे-धीरे रगड़कर उसे छुड़ाने के बाद ताजे पानी से स्नान करें। यह प्रयोग किसी तालाब के किनारे जाकर तालाब की साफ मिट्टी से भी किया जा सकता है। यह स्नान बहने वाले फोडे-फुंसियोँ वाले शरीर के लिए अत्यन्त उपयोगी है। त्वचा की गन्दगी को हटाकर त्वचा को उजला बनाने में यह स्नान लाभप्रद है। सम्पूर्ण शरीर से विष को खींचकर शरीर का आन्तरिक शोधन करने में विशेष उपयोगी है।

मिट्टी की गरम पट्टी:  पट्टी के लिए साफ बलुई मिट्टी (जिसमें आधी मिट्टी एवं आधा बालू हो ) यदि यह न उपलब्ध हो तो किसी साफ जगह पर जमीन से एक- डेढ फिट नीचे की मिट्टी लेकर साफ करने के बाद उसमें पानी मिलाकर किसी लकड़ी आदि से चलाकर लुगदी जैसी बना लें। अब इस मिट्टी को रोगग्रस्त स्थान के आकार से थोड़ा बड़ा महीन कपड़े पर फैलाकर लगभग आधा इंच मोटाई की पट्टी बना लें। इस पट्टी का मिट्टी की तरफ वाला भाग रोगग्रस्त अंग पर रखकर किसी ऊनी कपड़े से ढक दें।

मिट्टी की ठण्डी पट्टी: इस पट्टी को बनाने की विधि गरम पट्टी की तरह ही है।अन्तर सिर्फ इतना है कि इस पट्टी को रोगग्रस्त अंग रखने के उपरान्त ऊनी कपड़े से नही ढकते बल्कि इसे खुला ही रहने देते हैं।

पेड़ू की मिट्टी पट्टी:  इस पट्टी का प्रयोग अन्य रोगों के अतिरिक्त मुख्य रूप से कब्ज दूर करने के लिए किया जाता है। इस पट्टी को बनाने हेतु  ‘मड ट्रे‘ के नाम से एक सांचा बाजार में मिल जाता है यदि वह न मिले तो उपर्युक्त विधि से लगभग 15 इंच लम्बी, 8 इंच चैड़ी तथा एक इंच मोटी पट्टी बना लें।

सावधानियाँ: यदि मिट्टी की शुद्धता पर संदेह हो तो उसे किसी बर्तन में गर्म करके ठण्डा कर लें। मलेरिया के ज्वर में,दमा के दौरे में एवं दिल का दौरा पड़ने पर पेड़ू पर मिट्टी-पट्टी का प्रयोग न करें। बालू मिश्रित मिट्टी न मिल पाने पर कच्ची ईंट को पानी में भिगोकर उपयोग में लाया जा सकता है।

मिट्टी-पट्टी बनाने के लिए मिट्टी को 10-12 घंटे पहले पानी में भिगोना सर्वोत्तम है। भिगोई गई मिट्टी का उपयोग चार-पाँच दिनों में कर लेना चाहिए। मिट्टी की लुगदी बनाते समय उसमें हाथ नहीं डालना चाहिए बल्कि किसी लकड़ी या चम्मच से चलाना चाहिए। एक बार उपयोग की गई मिट्टी का पुनः उपयोग नहीं करना चाहिए।

कब्ज: कब्ज को समस्त रोगों की जननी कहा जाता है अतः कब्ज होते ही इसकी चिकित्सा तुरन्त करनी चाहिए। कब्ज की चिकित्सा निम्न विधि से करें– प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर खाली पेट पेड़ू पर गर्म पानी की थैली से 10 मिनट गर्म सेंक करने के बाद पेड़ू पर 45 मिनट के लिए गर्म मिट्टी की पट्टी लगाएं (गर्म पट्टी से आशय है, जैसा कि पीछे पट्टी बनाने की विधि में बताया जा चुका है कि मिट्टी की पट्टी लगाकर ऊपर से ऊनी कपड़े से ढक दें।) जीर्ण कब्ज में इसे सुबह- शाम दोनों समय किया जा सकता है। शाम को भोजन से पहले ही यह प्रयोग करें।

बवासीर:  बवासीर कब्ज का ही परिणाम होती है इस रोग में मलद्वार के बाहर व अन्दर की नाड़ियां सूजन की वजह से फूल जाती हैं। इस रोग की चिकित्सा कब्ज की चिकित्सा विधि के अनुसार करें। इसके अतिरिक्त गूदा (मलद्वार) के मस्सों पर भी गीली मिट्टी की पुल्टिस (गेंद जैसी) रखें एवं उसे किसी गर्म ऊनी कपड़े से बाँध दें।

दाद: दाद एक ऐसा चर्म रोग है जो जल्दी ठीक नहीं होता परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा से इससे मुक्ति पाई जा सकती है। इसके लिए दादग्रस्त स्थान पर 5 मिनट गर्म सेंक देने के बाद लगभग 30 मिनट के लिए गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी का प्रयोग करना चाहिए।

खुजली: इस रोग में छोटी-छोटी फुंसियाँ निकलती हैं जिनमें खुजली एवं जलन होती है। इस रोग की चिकित्सा निम्न विधि से करें-प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक 10 मिनट + पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी 45 मिनट + नीम की पत्तियों को डालकर उबाले गए पानी का एनिमा।( एनिमा की विधि अंत में दी गई है)

खुजली किसी अंग विशेष में हो तो वहाँ पर 5 मिनट गर्म सेंक देकर दिन में दो बार 30 मिनट के लिए गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी लगाएं और यदि पूरे शरीर में हो तो पूरे शरीर का गीली मिट्टी स्नान लें।

हिचकी:- हिचकी एक ऐसी क्रिया है जो कभी न कभी प्रत्येक व्यक्ति को आती है, परन्तु सामान्य स्थिति में यह 1-2 मिनट में स्वतः बन्द भी हो जाती है पर यदि यह घंटों या कई दिनों तक बन्द न हो तो कष्टकारी हो जाती है तब इसे रोग की संज्ञा दी जाती है। यह स्थिति किसी गंभीर रोग की चेतावनी भी हो सकती है। इस अवस्था में निम्न उपचार लें: प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक 10 मिनट + पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी 45 मिनट लें। सांयकाल में पुनः उपरोक्त उपचार करें।

ततैया, मधुमक्खी, बिच्छू आदि का विष उतारने के लिए: जहाँ पर विषैला काटे या डंक मारे, सर्वप्रथम उस स्थान को खूब ठण्डे पानी में भिगोएं या कपड़े की पट्टी को बार- बार ठण्डे पानी में भिगोकर रखें। 5 मिनट ठण्डा करने के बाद उस स्थान को हथेली से रगड़ें, तत्पश्चात गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी दिन में कई बार 30-30 मिनट के लिए लगाएं। जहर उतर जाएगा दर्द, सूजन समाप्त हो जाएगी।

एक्ज़िमा (उकवत):- उकवत एक ऐसा कष्टपूर्ण रोग है जो दवाओं से जड़ से ठीक नहीं होता परन्तु यदि सब्र एवं विश्वासपूर्वक इसकी प्राकृतिक चिकित्सा की जाए तो निश्चित रूप से इस रोग से मुक्ति मिल सकती है।

उपचार: प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक- 10 मिनट। पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी-45 मिनट + नीम की पत्तियों को डालकर उबाले गए पानी का एनिमा। एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक-5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट। दोपहर:- एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक- 5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट। सायंकाल:-एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक- 5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट।

आहार : एक्ज़िमा रोगी को चाहिए कि वह बिल्कुल सादा भोजन करे। नमक,मिर्च-मसाले,अचार, मुरब्बा एवं चीनी का पूर्णत्या त्याग कर दे। भोजन में हरी सब्जियों को उबाल कर लें साथ ही चोकर समेत आंटे (बिना छना आंटा ) की रोटी, सलाद व फलों का प्रयोग करें। इस रोग को ठीक होने में रोग की अवस्था के अनुसार तीन माह तक का समय लग सकता है। कुछ समय बाद उपरोक्त उपचार में परिवर्तन किया जा सकता है।

बुखार: बुखार की अवस्था में पेड़ू पर गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी दिन में 3-4 बार 30-30 मिनट के लिए लगाना चाहिए। अधिकांशतः 3-4 पट्टियों ही बुखार चला जाता है।

विषेश: तेज बुखार में यदि घबराहट बहुत बढ़ जाए तो पेड़ू पर गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी के साथ-साथ माथे पर भी गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी लगाएं। कंपकंपी के साथ बुखार हो तो  मिट्टी पट्टी का प्रयोग न करें। बुखार की अवस्था में नींबू पानी, जूस या सूप के अतिरिक्त कोई ठोस आहार न लें।

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किडनी फेल्योर(गुर्दे खराब) रोगी घबराएँ नहीं ,ये है अनुपम औषधि .

किडनी फेल्योर क्या है ?

     शरीर मे किडनी का मुख्य कार्य शुद्धिकरण का होता है| लेकिन किडनी के किसी रोग की वजह से जब दोनों गुर्दे अपना सामान्य कार्य करने मे अक्षम हो जाते हैं तो इस स्थिति को हम किडनी फेल्योर कहते हैं| खून मे क्रिएट्नीन और यूरिया की मात्रा की जांच से किडनी की कार्यक्षमता का पता चलता है| वैसे तो किडनी की क्षमता  शरीर की आवश्यकता से ज्यादा होती है इसलिए गुर्दे को थोड़ा नुकसान हो भी जाये तो भी खून की जाच मे कोई खराबी देखने को नहीं मिलती है| जब रोग के कारण किडनी 50 प्रतिशत से ज्यादा खराब हो जाती तभी खून की जांच मे यूरिया और क्रिएट्नीन की बढ़ी हुई मात्रा का प्रदर्शन होता है|किडनी वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवश यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है।


वात रोग (जोड़ों का दर्द ,कमर दर्द,गठिया,सूजन,लकवा) को दूर करने के उपाय* 

     गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है।गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज  मे हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग,मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है।

किडनी  अकर्मण्यता  के लक्षण-

1. उल्टी होना 

 2. भूख न लगाना

 3. थकावट और कमजोरी महसूस होना

 4. नींद की समस्या होना

5. पेशाब की मात्रा कम हो जाना

 6. दिमाग ठीक से काम नहीं करना

 7. हिचकी आना

8. मांसपेशयों मे खिंचाव और आक्षेप आना 

 9. पैरों और टखने मे सूजन आना 

 10. लगातार खुजली होने की समस्या 

11. हृदय मे पानी जमा होने पर छाती मे दर्द होना 

 12. हाई ब्ल प्रेशर जिसे से कट्रोल करना कठिन हो|

किडनी खराब करने  वाली 10 आदतें-

1) पेशाब आने पर करने न जाना (रोकना)

2) रोज 8 गिलास से कम पानी पीना

3) बहुत ज्यादा नमक खाना

4) उच्च रक्त चाप के ईलाज मे लापरवाही

5) शुगर के ईलाज मे लापरवाही

6) अधिक मांसाहार करना

7 दर्द नाशक(पेन किलर) दवाएं लगातार लेते रहना

8) ज्यादा शराब पीना

9) काम के बाद जरूरी मात्रा मे आराम नहीं करना

10) कोला , पेप्सी आदि साफ्ट ड्रिंक्स और सोडा पीना 


*पित्ताश्मरी(Gallstone) की अचूक औषधि*

    हमारे गुर्दे रक्त में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों और जल को फ़िल्टर कर मूत्र के रूप में बाहर निकालने की क्रिया संपन्न करते हैं। हमारी मांसपेशियों में उपस्थित क्रिएटिन फ़ास्फ़ेटस के विखंडन से उर्जा उत्पन होती है और इसी प्रक्रिया में अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटनीन बनता है । स्वस्थ गुर्दे अधिकांश क्रिएटनीन को फ़िल्टर कर मूत्र में निष्कासित करते रहते हैं। अगर खून में क्रिएटनीन का स्तर १.५ से ज्यादा हो जाता है तो समझा जाता है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये खून में क्रिएटनीन की मात्रा का परीक्षण करना जरूरी होता है। अब मैं कुछ ऐसे उपाय बताना चाहूंगा जिनको व्यवहार में लाकर रोगी अपने खून मे क्रिटनीन की मात्रा घटा सकते हैं। ये ऊपाय गुर्दे का कार्य-भार कम करते हैं जिससे खून में उपस्थित क्रिएटनीन का लेविल कम होने में मदद मिलती है। क्रिएटनीन कम करने वाले भोजन में प्रोटीन, फ़ास्फ़ोरस,पोटेशियम,नमक की मात्रा बिल्कुल कम होने पर ध्यान दिया जाता है। जिन भोजन पदार्थों में इन तत्वों की अधिकता हो उनका परहेज करना आवश्यक है।


सोरायसिस(छाल रोग) के आयुर्वेदिक उपचार 


    जब उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ उपयोग नहीं किये जाएंगे तो मांसपेशियों में कम क्रिएटीन मौजूद रहेगा अत: क्रिएटनीन भी कम बनेगा। किडनी को भी अपशिष्ट पदार्थ को फ़िल्टर करने में कम ताकत लगानी पडेगी जिससे किडनी की तंदुरस्ती में इजाफ़ा होगा। याद रखने योग्य है कि क्रिएटिन के टूटने से ही क्रिएटनीन बनता है। एक और जहां उच्च क्रिएटनीन लेविल गुर्दे की गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है वही शरीर में जल की कमी से समस्या और गंभीर हो जाती है। जल की कमी से रक्तगत क्रिएटनीन में वृद्धि होती है। अत: महिलाओं को २४ घंटे में २.५ लिटर तथा पुरुषों को ३.५ लिटर पानी पीने की सलाह दी जाती है। चाय ,काफ़ी में केफ़ीन तत्व ज्यादा होता है जो गुर्दे के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।अत: इनका सर्वथा परित्याग आवश्यक है।

    मूत्र प्रणाली में कोई संक्रामक रोग हो जाने से भी रक्तगत क्रिएटनीन बढ सकता है। अत: इस विषय में सावधानी पूर्वक इलाज करवाना चाहिये। उच्च रक्त चाप से गुर्दे को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं को नुकसान होता है। इससे भी रक्त गत क्रिएटनीन बढ जाता है। अत: ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के उपाय करना जरूरी है।मेरा ब्लड प्रेशर संबंधी लेख ध्यान से पढें। नमक ३ ग्राम से ज्यादा हानिकारक है।<नियमित २० मिनिट व्यायाम करने और ३ किलोमिटर घूमने से खून में क्रिएटनीन की मात्रा काबू करने में मदद मिलती है।व्यायाम और घूमने के मामले में बिल्कुल आलस्य न करें ।

    मधुमेह रोग धीरे -धीरे गुर्दे को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिये यह रोग भी रक्तगत क्रिएटनीन को बढाने में अपनी भूमिका निर्वाह करता है। खून में शर्करा संतुलित बनाये रखने के उपाय आवश्यक हैं।

डायबीटीज पर मेरा लेख पढें और तदनुसार उपाय करें।


बिदारीकन्द के औषधीय उपयोग 


     प्रोटीन हमारे शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों के निर्माण में उपयोग होता है। इससे रोगों के विरुद्ध लडने में भी मदद मिलती है। जब प्रोटीन शारीरिक क्रियाओं के लिये टूटता है तो इससे यूरिया अपशिष्ट पदार्थ बनता है। अकर्मण्य अथवा क्षतिग्रस्त किडनी इस यूरिया को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती है। खून में यूरिया का स्तर बढने पर क्रिएटनीन भी बढेगा । मांस में और अंडों में किडनी के लिये सबसे ज्यादा हानिकारक प्रोटीन पाया जाता है।अत: किडनी रोगी को ये भोजन पदार्थ नहीं लेना चाहिये। प्रोटीन की पूर्ति थोडी मात्रा में दालो के माध्यम से कर सकते हैं।


शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 


* किडनी के सुचारु कार्य नहीं करने से खून में पोटेशियम का लेविल बहुत ज्यादा बढ जाता है। पोटेशियम की अधिकता से अचानक हार्ट अटेक होने की सम्भावना बढ जाती है। अगर लेबोरेटरी जांच में रक्त में पोटेशियम बढा हुआ पाया जाए तो कम पोटेशियम वाला खाना लेना चाहिये।

*  पाईनेपल,शिमला मिर्च,पत्ता गोभी,फूल गोभी,लहसुन,प्याज,अंडे की सफेदी,जेतुन का तेल,मछली,, खीरा ककडी,गाजर,सेव,लाल अंगूर और सफ़ेद चावल  कम पोटेशियम वाले भोजन  पदार्थ हैं ।

* केला,तरबूज,किशमिस,पालक टमाटर, आलू बुखारा ,भूरे  चावल,संतरा,आलू का उपयोग वर्जित है।इनमे अधिक पोटेशियम पाया जाता है।लेकिन अगर पोटेशियम वांछित स्तर का हो तो इन फ़लों का इस्तेमाल किया जा सकता है।


हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार


क्रोनिक किडनी फेल्योर  के कारणों का उपचार –

*डायबीटीज और उच्च रक्तचाप  का उचित इलाज |

*पेशाब में इन्फेक्शन का  सही उपचार|

*किडनी में पथरी  का हर्बल उपचार जो गुर्दे की कार्यक्षमता  बढाता हो|

एलौपथिक पद्धति में  किडनी फेल्योर के लिए कोई  स्पेसिफिक  मेडिसिन नहीं है और  शुगर और ब्लड  प्रेशर  नियंत्रण  पर ही ज्यादा  ध्यान देते हैं|

* दामोदर चिकित्सालय  की  हर्बल औषधि क्रोनिक किडनी फेल्योर में वरदान तुल्य  सिद्ध होती है| बढ़ा हुआ क्रिएटनिन धीरे धीरे  नीचे  आने लगता  है | हाँ , हिमोग्लोबिन  बढाने के लिए  एरिथ्रोपोएटिन इंजेक्शन  की मदद  ली जा सकती है|


नसों में होने वाले दर्द से निजात पाने के तरीके 


किडनी के मरीज क्या खाएँ-

रोगी की किडनी कितने प्रतिशत काम रही है, उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए तो किडनी की आगे और खराब होने से रोका जा सकता है :

1. प्रोटीन : 1 ग्राम प्रोटीन/किलो मरीज के वजन के हिसाब से लिया जा सकता है। नॉनवेज खाने वाले 1 अंडा, 30 ग्राम मछली, 30 ग्राम चिकन और वेज लोग 30 ग्राम पनीर, 1 कप दूध, 1/2 कप दही, 30 ग्राम दाल

2. कैलरी : दिन भर में 7-10 सर्विंग कार्बोहाइड्रेट्स की ले सकते हैं।

 1 सर्विंग बराबर होती है – 1 स्लाइस ब्रेड, 1/2 कप चावल या 1/2 कप पास्ता।

3. विटामिन : दिन भर में 2 फल और 1 कप सब्जी लें।

4. सोडियम : एक दिन में 1/4 छोटे चम्मच से ज्यादा नमक न लें। अगर खाने में नमक कम लगे तो नीबू, इलाइची, तुलसी आदि का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करें। पैकेटबंद चीजें जैसे कि सॉस, आचार, चीज़, चिप्स, नमकीन आदि न लें।

5. फॉसफोरस : दूध, दूध से बनी चीजें, मछली, अंडा, मीट, बीन्स, नट्स आदि फॉसफोरस से भरपूर होते हैं इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही लें।

6. कैल्शियम : दूध, दही, पनीर, फल और सब्जियां उचित मात्रा में लें। ज्यादा कैल्शियम किडनी में पथरी का कारण बन सकता है।


आँव रोग (पेचिश) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


7. पोटैशियम : फल, सब्जियां, दूध, दही, मछली, अंडा, मीट में पोटैशियम काफी होता है। इनकी ज्यादा मात्रा किडनी पर बुरा असर डालती है। इसके लिए केला, संतरा, पपीता, अनार, किशमिश, भिंडी, पालक, टमाटर, मटर न लें। सेब, अंगूर, अनन्नास, तरबूज़, गोभी ,खीरा , मूली, गाजर ले सकते हैं।

8. फैट : खाना बनाने के लिए वेजिटेबल या ऑलिव आईल  का ही इस्तेमाल करें। बटर, घी और तली -भुनी चीजें न लें। फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड दूध ही लें।
9. तरल चीजें : शुरू में जब किडनी थोड़ी ही खराब होती है तब सामान्य मात्रा में तरल चीजें ली जा सकती हैं, पर जब किडनी काम करना कम कर दे तो तरल चीजों की मात्रा का ध्यान रखें। सोडा, जूस, शराब आदि न लें। किडनी की हालत देखते हुए पूरे दिन में 5-7 कप तरल चीजें ले सकते हैं।
10. सही समय पर उचित मात्रा में जितना खाएं, पौष्टिक खाएं।
11. अंकुरित मूंग किडनी खराब रोगी के लिए उत्तम आहार है| अंकुरित मूंग को भली प्रकार उबालकर जीवाणु रहित कर लेना चाहिए|

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ –

इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम –     राजेन्द्र द्विवेदी  

पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 

इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट –

जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 

ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl

S.Creatinine –  10.9mg/dl

हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 

जांच रिपोर्ट  दिनांक – 14/9/2017 

ब्लड यूरिया –     31mg/dl

S.Creatinine  1.6mg/dl

जांच रिपोर्ट –

 दिनांक -22/9/2017

 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 

blood urea – 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl

Conclusion- All  investigations normal 




 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम – Awdhesh 

निवासी – कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट


दिनांक – 26/4/2016


Urea- 55.14   mg/dl


creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल –




creatinine 1.34 mg/dl


urea 22  mg/dl

गठिया (संधिवात) रोग की अनुपम औषधि

विशेष रुप से प्रदर्शित
आमवात जिसे गठिया भी कहा जाता है अत्यंत पीडादायक बीमारी है।अपक्व आहार रस याने “आम” वात के साथ संयोग करके गठिया रोग को उत्पन्न करता है।अत: इसे आमवात भी कहा जाता है।
लक्षण- जोडों में दर्द होता है, शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ जाती है। छोटे -बडे जोडों में सूजन का प्रकोप होता रहता है।


यूरिक एसीड के कण(क्रिस्टल्स)घुटनों व अन्य जोडों में जमा हो जाते हैं।जोडों में दर्द के मारे रोगी का बुरा हाल रहता है।गठिया के पीछे यूरिक एसीड की जबर्दस्त भूमिका रहती है। इस रोग की सबसे बडी पहचान ये है कि रात को जोडों का दर्द बढता है और सुबह अकडन मेहसूस होती है। यदि शीघ्र ही उपचार कर नियंत्रण नहीं किया गया तो जोडों को स्थायी नुकसान हो सकता है।
गठिया के मुख्य कारण:–
*महिलाओं में एस्ट्रोजिन हार्मोन की कमी होने पर गठिया के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
*अधिक खाना और व्यायाम नहीं करने से जोडों में विकार उत्पन्न होकर गठिया जन्म लेता है।
*छोटे बच्चों में पोषण की कमी के चलते उनका इम्युन सिस्टम कमजोर हो जाता है फ़लस्वरूप रुमेटाईड आर्थराईटीज रोग पैदा होता है जिसमें जोडों में दर्द ,सूजन और गांठों में अकडन रहने लगती है।
*शरीर में रक्त दोष जैसे ल्युकेमिया होने अथवा चर्म विकार होने पर भी गठिया रोग हो सकता है।
*थायराईड ग्रन्थि में विकार आने से गठिया के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
*आंतों में पैदा होने वाले रिजाक्स किटाणु शरीर के जोडों को भी दुष्प्रभावित कर सकते हैं।
गठिया के ईलाज में हमारा उद्धेश्य शरीर से यूरिक एसीड बाहर निकालने का प्रयास होना चाहिये। यह यूरिक एसीड प्यूरीन के चयापचय के दौरान हमारे शरीर में निर्माण होता है। प्यूरिन तत्व मांस में सर्वाधिक होता है।इसलिये गठिया रोगी के लिये मांसाहार जहर के समान है। वैसे तो हमारे गुर्दे यूरिक एसीड को पेशाब के जरिये बाहर निकालते रहते हैं। लेकिन कई अन्य कारणों की मौजूदगी से गुर्दे यूरिक एसीड की पूरी मात्रा पेशाब के जरिये निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये जिन भोजन पदार्थो में पुरीन ज्यादा होता है,उनका उपयोग कतई न करें। वैसे तो पतागोभी,मशरूम,हरे चने,वालोर की फ़ली में भी प्युरिन ज्यादा होता है लेकिन इनसे हमारे शरीर के यूरिक एसीड लेविल पर कोई ज्यादा विपरीत असर नहीं होता है। अत: इनके इस्तेमाल पर रोक नहीं है। जितने भी सोफ़्ट ड्रिन्क्स हैं सभी परोक्ष रूप से शरीर में यूरिक एसीड का स्तर बढाते हैं,इसलिये सावधान रहने की जरूरत है।
१) सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मौसम के मुताबिक ३ से ६ लिटर पानी पीने की आदत डालें। ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे।
२) आलू का रस १०० मिलि भोजन के पूर्व लेना हितकर है।
३) संतरे के रस में १५ मिलि काड लिवर आईल मिलाकर शयन से पूर्व लेने से गठिया में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
४) लहसुन,गिलोय,देवदारू,सौंठ,अरंड की जड ये पांचों पदार्थ ५०-५० ग्राम लें।इनको कूट-खांड कर शीशी में भर लें। २ चम्मच की मात्रा में एक गिलास पानी में डालकर ऊबालें ,जब आधा रह जाए तो उतारकर छान लें और ठंडा होने पर पीलें। ऐसा सुबह-शाम करने से गठिया में अवश्य लाभ होगा।
५) लहसुन की कलियां ५० ग्राम लें।सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ २-२ ग्राम लेकर लहसुन की कलियों के साथ भली प्रकार पीस कर मिलालें। यह मिश्रण अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। आधा या एक चम्मच दवा पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।
६) हर सिंगार (पारिजात) के ताजे पती ४-५ नग लें। पानी के साथ पीसले या पानी के साथ मिक्सर में चलालें। यह नुस्खा सुबह-शाम लें ३-४ सप्ताह में गठिया और वात रोग में जबरदस्त लाभ होगा| जरूर आजमाएं।
७) बथुआ के पत्ते का रस करीब ५० मिलि प्रतिदिन खाली पेट पीने से गठिया रोग में जबर्दस्त फ़ायदा होता है। अल सुबह या शाम को ४ बजे रस लेना चाहिये।जब तक बथुआ सब्जी मिले या २ माह तक उपचार लेना उचित है।रस लेने के आगे पीछे १ घंटे तक कुछ न खाएं। बथुआ के पत्ते काटकर आटे में गूंथकर चपाती बनाकर खाना भी हितकारी उपाय है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा भी कई मामलों मे फ़लप्रद सिद्ध हो चुकी है।
८) पंचामृत लोह गुगल,रसोनादि गुगल,रास्नाशल्लकी वटी,तीनों एक-एक गोली सुबह और रात को सोते वक्त दूध के साथ २-३ माह तक लेने से गठिया में बहुत फ़ायदा होता है।
९) उक्त नुस्खे के साथ अश्वगंधारिष्ट ,महारास्नादि काढा और दशमूलारिष्टा २-२ चम्मच मिलाकर दोनों वक्त भोजन के बाद लेना हितकर है।
१०) चिकित्सा वैग्यानिकों का मत है कि गठिया रोग में हरी साग सब्जी का प्रचुरता से इस्तेमाल करना बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जियो का रस भी अति उपयोगी रहता है।
11) भाप से स्नान करने और जेतुन के तैल से मालिश करने से गठिया में अपेक्षित लाभ होता है।
१२) गठिया रोगी को कब्ज होने पर लक्षण उग्र हो जाते हैं। इसके लिये गुन गुने जल का एनिमा देकर पेट साफ़ रखना आवश्यक है।
१३) अरण्डी के तैल से मालिश करने से भी गठिया का दर्द और सूजन कम होती है।
१४) सूखे अदरक (सौंठ) का पावडर १० से ३० ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करना गठिया में परम हितकारी है|
१५) चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि गठिया रोगी को जिन्क,केल्शियम और विटामिन सी के सप्लीमेंट्स नियमित रूप से लेते रहना लाभकारी है।
१६) गठिया रोगी के लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान कारक होते हैं। अधिक परिश्रम से अस्थि-बंधनो को क्षति होती है जबकि अधिक गतिहीनता से जोडों में अकडन पैदा होती है।
१७) गठिया उग्र होने पर किसी भी प्रकार का आटा ३ हफ्ते तक भोजन में शामिल ना करें| बाद में धीरे धीरे उपयोग शुरू करें|
१८) पनीर ,दही,माखन,इमली,कच्चा आम का उपयोग बंद करने से लाभ होता है|
१९) शकर की जगह शहद वापरें|
२०) हल्दी गठिया का दर्द घटाती है और सूजन भी कम करती है|
२१) प्याज,लहसुन और सेवफल का उपयोग हितकारी रहता है|
22) लहसुन की 10 कलियों को 100 ग्राम पानी एवं 100 ग्राम दूध में मिलाकर पकाकर उसे पीने से दर्द में शीघ्र ही लाभ होता है।
23) प्रतिदिन नारियल की गिरी के सेवन से भी जोड़ो को ताकत मिलती है।
24) आलू का रस 100 ग्राम प्रतिदिन भोजन के पूर्व लेना बहुत हितकर है।
25) सुबह के समय सूर्य नमस्कार और प्राणायाम करने से भी जोड़ों के दर्द से स्थाई रूप से छुटकारा मिलता है।
26) गठिया के रोगी 4-6 लीटर पानी पीने की आदत डालें। इससे ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे।
27) एक बड़ा चम्मच सरसों के तेल में लहसुन की 3-4 कुली पीसकर डाल दें, इसे इतना गरम करें कि लहसुन भली प्रकार पक जाए, फिर इसे आच से उतारकर मामूली गरम हालत में इससे जोड़ों की मालिश करने से दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है।
28) प्रात: खाली पेट एक लहसन कली, दही के साथ दो महीने तक लगातार लेने से जोड़ो के दर्द में आशातीत लाभ प्राप्त होता है।

29) 250 ग्राम दूध एवं उतने ही पानी में दो लहसुन की कलियाँ, 1-1 चम्मच सोंठ और हरड़ तथा 1-1 दालचीनी और छोटी इलायची डालकर उसे अच्छी तरह से धीमी आँच में पकायें। पानी जल जाने पर उस दूध को पीयें, शीघ्र लाभ प्राप्त होगा ।
30) 100 ग्राम लहसुन की कलियां लें।इसे सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ 5-5 ग्राम के साथ पीस कर मिला लें। फिर इसे अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। इसे एक चम्मच पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।
31) अमरूद की 4-5 नई कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाने से से जोड़ो के दर्द में काफी राहत मिलती है। *काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करें। उसके बाद ठंडा होने पर उस तेल को मांसपेशियों पर लगाएं, दर्द में तुरंत आराम मिलेगा।
32) दो तीन दिन के अंतर से खाली पेट अरण्डी का 10 ग्राम तेल पियें। इस दौरान चाय-कॉफी कुछ भी न लें जल्दी ही फायदा होगा।
33) दर्दवाले स्थान पर अरण्डी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म-गर्म बाँधे इससे भी तुरंत लाभ मिलता है।
34) गाजर को पीस कर इसमें थोड़ा सा नीम्बू का रस मिलाकर रोजाना सेवन करें । यह जोड़ो के लिगामेंट्स का पोषण कर दर्द से राहत दिलाता है।
35) गठिया रोगी को अपनी क्षमतानुसार हल्का व्यायाम अवश्य ही करना चाहिए क्योंकि इनके लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान दायक हैं।
36) जेतुन के तैल से मालिश करने से भी गठिया में बहुत लाभ मिलता है।
37) सौंठ का एक चम्मच पावडर का नित्य सेवन गठिया में बहुत लाभप्रद है।
38) गठिया रोग में हरी साग सब्जी का इस्तेमाल बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जीयो का रस भी बहुत लाभदायक रहता है।
39) दो बडे चम्मच शहद और एक छोटा चम्मच दालचीनी का पावडर सुबह और शाम एक गिलास मामूली गर्म जल से लें। एक शोध में कहा है कि चिकित्सकों ने नाश्ते से पूर्व एक बडा चम्मच शहद और आधा छोटा चम्मच दालचीनी के पावडर का मिश्रण गरम पानी के साथ दिया। इस प्रयोग से केवल एक हफ़्ते में ३० प्रतिशत रोगी गठिया के दर्द से मुक्त हो गये। एक महीने के प्रयोग से जो रोगी गठिया की वजह से चलने फ़िरने में असमर्थ हो गये थे वे भी चलने फ़िरने लायक हो गये।
40) एक चम्मच मैथी बीज रात भर साफ़ पानी में गलने दें। सुबह पानी निकाल दें और मैथी के बीज अच्छी तरह चबाकर खाएं।मैथी बीज की गर्म तासीर मानी गयी है। यह गुण जोड़ों के दर्द दूर करने में मदद करता है।
इससे कैसे बचें-
कुछ उपाय बताता हूँ जिन्हें अपनाकर इसकी चपेट में आने से बचा जा सकता है या इसकी चपेट में आने पर स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
* आर्थराइटिस के कारण कार्टिलेज को नुकसान पहुंचता है। यह 70 प्रतिशत पानी से बने होते हैं, इसलिए ढेर सारा पानी पिएं।

* कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों जैसे दूध, दुग्ध उत्पादों, ब्रोकली, सामन मछली,
*पालक, राजमा, मूंगफली, बादाम, टोफू आदि का सेवन करें।
*जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन सी और डी बहुत जरूरी हैं। इसलिए विटामिन सी और डी से भरपूर खाद्य पदार्थों जैसे स्ट्रॉबेरी, संतरे, कीवी, अनन्नास, फूलगोभी, ब्रोकली, *पत्ता गोभी, दूध, दही, मछिलयों आदि का सेवन करें।
*कुछ समय धूप में भी बिताएं। यह विटामिन डी का बेहतरीन स्त्रोत है।
* वजन को नियंत्रण में रखें। वजन अधिक होने से जोड़ों जैसे घुटनों, टखनों और कूल्हों पर दबाव पड़ता है।
*नियमित रूप से व्यायाम करके आर्थराइटिस के खतरे को कम किया जा सकता है, लेकिन ऐसे व्यायाम करने से बचें, जिससे जोड़ों पर अधिक दबाव पड़ता है।
*शराब और धूम्रपान का सेवन जोड़ों को नुकसान पहुंचाता है। आर्थराइटिस से पीड़ित लोग अगर इनका सेवन बंद कर दें तो उनके जोड़ों और मांसपेशियों में सुधार आ जाता है और दर्द में भी कमी होती है।
*स्वस्थ लोग भी धूम्रपान न करें। यह आपको रूमेटाइड आर्थराइटिस का शिकार बना सकता है।
*अधिक मात्रा में फल और सब्जियों का सेवन करें। ये ऑस्टियो आर्थराइटिस से बचाते हैं।
* अदरक और हल्दी को भोजन में प्रमुखता से शामिल करें, क्योंकि ये जोड़ों की सूजन को कम करने में सहायता करते हैं।
*आरामतलबी से बचें।
* सूजन बढ़ाने वाले पदार्थ जैसे नमक, चीनी, अल्कोहल, कैफीन, तेल, दूध व दुग्ध उत्पादों, ट्रांस फैट और लाल मांस का इस्तेमाल कम करें या न करें।
गठिया का दर्द दूर करने का आसान उपाय-
* एक लिटर पानी तपेली या भगोनी में आंच पर रखें। इस पर तार वाली जाली रख दें। एक कपडे की चार तह करें और पानी मे गीला करके निचोड लें । ऐसे दो कपडे रखने चाहिये। अब एक कपडे को तपेली से निकलती हुई भाप पर रखें। गरम हो जाने पर यह कपडा दर्द करने वाले जोड पर ३-४ मिनिट रखना चाहिये। इस दौरान तपेली पर रखा दूसरा कपडा गरम हो चुका होगा। एक को हटाकर दूसरा लगाते रहें। यह उपक्रम रोजाना १५-२० मिनिट करते रहने से जोडों का दर्द आहिस्ता आहिस्ता समाप्त हो जाता है। बहुत कारगर उपाय है।

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हर्बल चिकित्सा के अनमोल  रत्न-

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विशिष्ट परामर्श-

 

संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी – बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द रहित सक्रियता  हासिल  करते  हैं |औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|

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विशेष रुप से प्रदर्शित

किडनी कैसे काम करती है?
किडनी एक बेहद स्पेशियलाइज्ड अंग है. इसकी रचना में लगभग तीस तरह की विभिन्न कोशिकाएं लगती हैं. यह बेहद ही पतली नलियों का अत्यंत जटिल फिल्टर है जो हमारे रक्त से निरंतर ही पानी, सोडियम, पोटैशियम तथा ऐसे अनगिनत पदार्थों को साफ करके पेशाब के जरिए बाहर करता रहता है।
यह फिल्टर इस मामले में अद्भुत है कि यहां से जो भी छनकर नली में नीचे आता है उसे किडनी आवश्यकतानुसार वापस रक्त में खींचता भी रहता है, और ऐसी पतली फिल्ट्रेशन नलियों की तादाद होती है? एक गुर्दे में ढाई लाख से लगाकर नौ लाख तक नेफ्रान या नलियां रहती हैं. हर मिनट लगभग एक लीटर खून इनसे प्रभावित होता है ताकि किडनी इस खून को साफ कर सके. दिन में लगभग डेढ़ हजार लीटर खून की सफाई चल रही है. और गुर्दे केवल यही काम नहीं करते बल्कि यह तो उसके काम का केवल एक पक्ष है, जिसके बारे में थोड़ा-थोड़ा पता सामान्यजनों को भी है परंतु क्या आपको ज्ञात है कि किडनी का बहुत बड़ा रोल प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड (शक्कर आदि) तथा फैट (चर्बी) की मेटाबोलिज्म (पाचन/ चय-अपचय) में भी है. इसलिए किडनी खराब होने पर कुपोषण के लक्षण हो सकते हैं बल्कि वे ही प्रमुख लक्षण बनकर सामने आ सकते हैं. हार्मोंस के प्रभाव में भी गुर्दों का अहम रोल है. इंसुलिन, विटामिन डी, पेराथायरायड आदि के प्रभाव को गुर्दे की बीमारी बिगाड़ सकती है।

शरीर में रक्त बनाने की सारी प्रक्रिया में गुर्दों का बेहद अहम किरदार है. गुर्दे में बनने वाला इरिथ्रोपोइरिन नामक पदार्थ खून बनाने वाली बोनमैरो को (बोनमैरो को आप हड्डियों में खून पैदा करने वाली फैक्टरी कह सकते हैं) खून बनाने के लिए स्टीम्यूलेट करता है. यह न हो तो शरीर में खून बनना बंद या कम हो जाता है. इनमें बहुत-सी बातों से स्वयं डॉक्टर भी परिचित नहीं होंगे या उन्होंने कभी पढ़ा तो था पर अब याद नहीं. नतीजा कई डाक्टरों का भी इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान नहीं जाता है कि किडनी फेल होने वाला मरीज पेशाब की शिकायत या सूजन आदि के अलावा और भी कई तरह से सामने आ सकता है.
सवाल यह है कि हमें कब सतर्क होकर Kidney का टेस्ट कराना चाहिए. कौन-से लक्षण हैं जो किडनी फेल्योर की ओर इंगित कर सकते हैं?


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हमारी किडनी शरीर में संतुलन बने रखने के कई कार्यों का निष्पादन करती हैं। वे अपशिष्ट उत्पादों को फिल्टर करके पेशाब से बहार निकालते हैं एवं निष्कासन करते हैं। वे शरीर में पानी की मात्रा, सोडियम, पोटेशियम और कैल्शियम की मात्रा (इलेक्ट्रोलाइट्स) को संतुलित करते हैं। वह अतिरिक्त अम्ल एवं क्षार निकालने में मदद करते हैं जिससे शरीर में एसिड एवं क्षार का संतुलन बना रहता है।
शरीर में किडनी का मुख्य कार्य खून का शुद्धीकरण करना है। जब बीमारी के कारण दोनों किडनी अपना सामान्य कार्य नहीं कर सके, तो किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है, जिसे हम किडनी फेल्योर कहते हैं।

खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा की जाँच से किडनी की कार्यक्षमता की जानकारी मिलती है। चूंकि किडनी की कार्यक्षमता शरीर की आवश्यकता से अधिक होती है। इसलिए यदि किडनी की बीमारी से थोड़ा नुकसान हो जाए, तो भी खून के परीक्षण में कई त्रुटि देखने को नहीं मिलती है। परन्तु जब रोगों के कारण दोनों किडनी 50 प्रतिशत से अधिक ख़राब हो गई हो, तभी खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा सामान्य से अधिक पाई जाती है।

क्या एक किडनी खराब होने से किडनी फेल्योर हो सकता है नहीं, यदि किसी व्यक्ति की दोनों स्वस्थ किडनी में से एक किडनी खराब हो गई हो या उसे शरीर से किसी कारणवश निकाल दिया गया हो, तो भी दूसरी किडनी अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाते हुए शरीर का कार्य पूर्ण रूप से कर सकती है।

*किडनी फेल्योर के दो मुख्य प्रकार है :

एक्यूट किडनी फेल्योर और क्रोनिक किडनी फेल्योर। इन दो प्रकार के किडनी फेल्योर के बीच का अंतर स्पष्ट मालूम होना चाहिए।

एक्यूट किडनी फेल्योर : एक्यूट किडनी फेल्योर में सामान्य रूप से काम करती दोनों किडनी विभिन्न रोगों के कारण नुकसान होने के बाद अल्प अवधि में ही काम करना कम या बंद कर देती है| यदि इस रोग का तुरन्त उचित उपचार किया जाए, तो थोड़े समय में ही किडनी संपूर्ण रूप से पुन: काम करने लगती है और बाद में मरीज को दवाइ या परहेज की बिलकुल जरूरत नहीं रहती| एक्यूट किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा और परहेज द्वारा किया जाता है |कुछ मरीजों में अल्प (कुछ दिन के लिए) डायालिसिस की आवश्यकता होती है|

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क्रोनिक किडनी फेल्योर : 

क्रोनिक किडनी फेल्योर (क्रोनिक किडनी डिजीज – CKD) में अनेक प्रकार के रोगों के कारण किडनी की कार्यक्षमता क्रमशः महीनों या वर्षों में कम होने लगती है और दोनों किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं| वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में क्रोनिक किडनी फेल्योर को ठीक या संपूर्ण नियंत्रण करने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है| क्रोनिक किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा, परहेज और नियमित परीक्षण द्वारा किया जाता है| शुरू में उपचार का हेतु कमजोर किडनी की कार्यक्षमता को बचाए रखना, किडनी फेल्योर के लक्षणों को काबू में रखना और संभावित खतरों की रोकथाम करना है| इस उपचार का उद्देश्य मरीज के स्वास्थ्य को संतोषजनक रखते हुए, डायालिसिस की अवस्था को यथासंभव टालना है| किडनी ज्यादा खराब होने पर सही उपचार के बावजूद रोग के लक्षण बढ़ते जाते हैं और खून की जाँच में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा अधिक बढ़ जाती है, ऐसे मरीजों में सफल उपचार के विकल्प सिर्फ डायालिसिस और किडनी प्रत्यारोपण है|

* नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम :

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक आम किडनी की बीमारी है। पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं।

किडनी के इस रोग की वजह से किसी भी उम्र में शरीर में सूजन हो सकती है, परन्तु मुख्यतः यह रोग बच्चों में देखा जाता है। उचित उपचार से रोग पर नियंत्रण होना और बाद में पुनः सूजन दिखाई देना, यह सिलसिला सालों तक चलते रहना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की विशेषता है। लम्बे समय तक बार-बार सूजन होने की वजह से यह रोग मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों के लिए एक चिन्ताजनक रोग है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी पर क्या कुप्रभाव पडता है? सरल भाषा में यह कहा जा सकता है की किडनी शरीर में छन्नी का काम करती है, जिसके द्वारा शरीर के अनावश्यक उत्सर्जी पदार्थ अतिरिक्त पानी पेशाब द्वारा बाहर निकल जाता है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेद बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और उत्सर्जी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है।

पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की मात्रा के अनुसार रोगी के शरीर में सूजन में कमी या वृध्दि होती है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन होने के बाद भी किडनी की अनावश्यक पदार्थों को दूर करने की कार्यक्षमता यथावत बनी रहती है अर्थात किडनी ख़राब होने की संभावना बहुत कम रहती है।


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* नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम किस कारण से होता है?

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाया है। श्वेतकणों में लिम्फोसाइट्स के कार्य की खामी (Auto Immune Disease) के कारण यह रोग होता है ऐसी मान्यता है। आहार में परिवर्तन या दवाइँ को इस रोग के लिए जिम्मेदार मानना बिलकुल गलत मान्यता है।

इस बीमारी के 90% मरीज बच्चे होते हैं जिनमें नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाता है। इसे प्राथमिक या इडीओपैथिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम भी कहते हैं। (सामान्यतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम दो से आठ साल की उम्र के बच्चों में ज्यादा पाया जाता है।)प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम चार महत्वपूर्ण पैथोलाजिकल रोगों के कारण हो सकता है। मिनीमल चेन्ज डिजीज (MCD), फोकल सेग्मेंन्टल ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस (FSGS), मेम्ब्रेनस नेफ्रोपेथी और मेम्ब्रेनोप्रोलिफरेटिव ग्लोमेंरुलो नेफ्राइटिस (MPGN)। प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक विशेष निदान है जिससे सेकेंडरी करणों के एक-एक कर हटाने के बाद ही इनका निदान होता है।

इसके 10 % से भी कम मामलों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम वयस्कों में अलग-अलग बीमारियों/करणों की वजह से हो सकता है। जैसे संक्रमण, किसी दवाई से हुआ नुकसान, कैंसर, वंशानुगत रोग, मधुमेह, एस. एल. ई. और एमाइलॉयडोसिस आदि में यह सिंड्रोम उपरोक्त बीमारियों के कारण हो सकता है।

एम. सी. डी. अर्थात् मिनीमल चेन्ज डिजीज, बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का सबसे आम कारण है। यह रोग 35 प्रतिशत छोटे बच्चों में (छः साल की उम्र तक) और 65 % मामलों में बड़े बच्चों में इडियोपैथिक (बिना किसी कारण) नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में होता है।

एम. सी. डी. (मिनीमल चेन्ज डिजीज) के रोगी में रक्तचाप सामान्य रहता है, लाल रक्त कोशिकाएं, पेशाब में अनुपस्थित रहती है और सीरम क्रीएटिनिन और कॉम्प्लीमेंट C3 / C4 के मूल्य सामान्य रहते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सभी कारणों में एम. सी. डी सबसे कम खराब बीमारी है। 90 % रोगी स्टेरॉयड उपचार से ही ठीक हो जाते हैं।

* नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मुख्य लक्षण :

यह रोग मुख्यतः दो से छः साल के बच्चों में दिखाई देता है। अन्य उम्र के व्यक्तियों में इस रोग की संख्या बच्चों की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है।

आमतौर पर इस रोग की शुरुआत बुखार और खाँसी के बाद होती है।


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रोग की शुरुआत के खास लक्षणों में आँखों के नीचे एवं चेहरे पर सूजन दिखाई देती है। आँखों पर सूजन होने के कारण कई बार मरीज सबसे पहले आँख के डॉक्टर के पास जाँच के लिए जाते हैं।

यह सूजन जब मरीज सोकर सुबह उठता है तब ज्यादा दिखती है, जो इस रोग की पहचान है। यह सूजन दिन के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कम होने लगती है और शाम तक बिलकुल कम हो जाती है।

रोग के बढ़ने पर पेट फूल जाता है, पेशाब कम होता है, पुरे शरीर में सूजन आने लगती है और वजन बड़ जाता है।

कई बार पेशाब में झाग आने और जिस जगह पर पेशाब किया हो, वहाँ सफेद दाग दिखाई देने की शिकायत होती है।

इस रोग में लाल पेशाब होना, साँस फूलना अथवा खून का दबाव बढ़ना जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में कौन से गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं?

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में जो संभावित जटिलताएं होती है, जल्दी संक्रमण होना, नस में रक्त के थक्के जमना (डीप वेन थ्रोम्बोसिस), रक्ताल्पता, बढ़े हुए कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के कारण ह्रदय रोग होना, किडनी खराब होना आदि महत्वपूर्ण है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान :

उन रोगियों में, जिन्हें शरीर में सूजन है उनके लिए पहला चरण है नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान करना। प्रयोगशाला परीक्षण से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।

पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना।

रक्त में प्रोटीन स्तर कम होना।

कोलेस्ट्रोल के स्तर का बढ़ा होना।


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* पेशाब की जाँच :

पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान की सबसे महत्वपूर्ण निशानी है।

पेशाब में श्वेतकणों, रक्तकणों या खून का नहीं जाना इस रोग के निदान की महत्वपूर्ण निशानी है।

24 घण्टों में पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की कुल मात्रा 3 ग्राम से अधिक होती है।

24 घंटे में शरीर से जो प्रोटीन कम हुआ है, उसका अनुमान 24 घंटे का पेशाब का संग्रह करके लगाया जा सकता है। इससे भी ज्यादा सरल है स्पॉट प्रोटीन/क्रीएटिनिन रेश्यो। इन परीक्षणों से प्रोटीन के नुकसान की मात्रा का सटीक माप प्राप्त होता है। इन परीक्षणों से पता चलता है की प्रोटीन का नुकसान हल्की, मध्यम या भारी मात्रा में हुआ है। इसके निदान के अलावा 24 घंटे की पेशाब में संभावित प्रोटीन की जाँच से इस बीमारी में उपचार के पश्चात् कितना सुधार हुआ है, यह भी जाना जा सकता है। उपचार के लिए इस पर नजर रखना अति उपयोगी है।पेशाब की जाँच सिर्फ रोग के निदान के लिए नहीं परन्तु रोग के उपचार कर नियमन के लिए भी विशेष महत्वपूर्ण है। पेशाब में जानेवाला प्रोटीन यदि बंद हो जाए, तो यह उपचार की सफलता दर्शाता है।

* खून की जाँच :

सामान्य जाँच : अधिकांश मरीजों में हीमोग्लोबिन, श्वेतकणों की मात्रा इत्यादि की जाँच आवश्कतानुसार की जाती है। निदान के लिए जरुरी जाँच: नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान के लिये खून की जाँच में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) कम होना और कोलेस्ट्रोल बढ़ जाना आवश्यक है। सामान्यतः खून की जाँच क्रीएटिनिन की मात्रा सामान्य पाई जाती है। अन्य विशिष्ट जाँच: डॉक्टर द्वारा आवश्कतानुसार कई बार करायी जानेवाली खून की विशिष्ट जाँचों में कोम्पलीमेंट, ए. एस. ओ. टाइटर, ए. एन. ए. टेस्ट, एड्स की जाँच, हिपेटाइटिस – बी की जाँच वगैरह का समावेश होता है। 2. रेडियोलॉजिकल जाँच : एस परीक्षण में पेट और किडनी की सोनोग्राफी, छाती का एक्सरे वगैरह शामिल होते हैं। किडनी की बायोप्सीनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सही कारण और अंर्तनिहित प्रकार को पहचानने में किडनी की बायोप्सी सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। किडनी बायोप्सी में किडनी के ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में इसकी माइक्रोस्कोप द्वारा जाँच की जाती है|


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नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का उपचार :

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपचार का लक्ष्य है मरीज को लक्षणों से राहत दिलवाना, पेशाब में जो प्रोटीन का नुकसान हो रहा है, उसमें सुधार लाना, जटिलताओं को रोकना और उनका इलाज करना और किडनी को बचाना है। इस रोग का उपचार आमतौर पर एक लंबी अवधि या कई वर्षों तक चलता है।

शरीर में सूजन, पेशाब में प्रोटीन, खून में कम प्रोटीन और कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की निशानी है।पेशाब की जाँच नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान और उपचार के नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।संक्रमण की वजह से नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन बार-बार हो सकती है, इसलिए संक्रमण न होने की सावधानी महत्वपूर्ण है

आहार में परहेज करना : 

सुजन हो और पेशाब कम आ रहा हो, तो मरीज को कम पानी और कम नमक लेने की सलाह दी जाती है। अधिकांश बच्चों को प्रोटीन सामान्य मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।

आहार में सलाह : मरीज के लिए आहार में सलाह या प्रतिबंध लगाते जाते हैं वो विभिन्न प्रकार के होते हैं। प्रभावी उपचार एवं उचित आहार से सूजन खत्म हो जाती है।

सूजन की मौजुदगी में :

 उन मरीजों को जिन्हें शरीर में सूजन है, उन्हें आहार में नमक में कमी और टेबल नमक में प्रतिबंध और वह भोज्य सामग्री जिसमें सोडियम की मात्रा अधिक हो, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिससे शरीर में सूजन और तरल पदार्थों को शरीर में जमा होने से रोका जा सके। वैसे इस बीमारी में तरल पदार्थों पर प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है|

सूजन न होने वाले मरीज : 

जिन रोगियों को प्रतिदिन स्टेरॉयड की उच्च मात्रा की खुराक मिलती है, उन्हें नमक की मात्रा सिमित करनी चाहिए जिससे रक्तचाप बढ़ने का जोखिम न हो । जिन मरीजों को सूजन है उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दिया जाना चाहिए जिससे प्रोटीन का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई हो सके और कुपोषण से बचाया जा सके। पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और विटामिन्स भी मरीजों को देना चाहिए|


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*लक्षण मुक्त मरीज (Remission) :

लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।

आहार पर अनावश्यक प्रतिबंध हटाना चाहिए। नमक और तरल पदार्थ का प्रतिबंध न रखें। मरीज को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दें।

अगर किडनी डिजीज है तो प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखें। रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए आहार में वसा का सेवन कम करें।

* संक्रमण का उपचार एवं रोकथाम :

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का विशेष उपचार शुरू करने से पहले बच्चे को यदि किसी संक्रमण की तकलीफ हो, तो ऐसे संक्रमण पर नियंत्रण स्थापित करना बहुत ही आवश्यक है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों को सर्दी, बुखार एवं अन्य प्रकार के संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है।

उपचार के दौरान संक्रमण होने से रोग बढ़ सकता है। इसलिए उपचार के दौरान संक्रमण न हो इसके लिए पूरी सावधानी रखना तथा संक्रमण होने पर तुरंत सघन उपचार कराना अत्यंत आवश्यक है।

*दवाइँ द्वारा उपचार : विशिष्ट दवा द्वारा इलाज

स्टेरॉयड चिकित्सा : 

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में लक्षण मुक्त करने के लिए प्रेडनिसोलोन एक मानक उपचार है। अधिकांश बच्चों पर इस दवा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 1 से 4 हफ्ते में सूजन और पेशाब में प्रोटीन दोनों गायब हो जाते हैं। पेशाब जब प्रोटीन से मुक्त हो जाये तो उस स्थिति को रेमिषन कहते हैं।

वैकल्पिक चिकित्सा : बच्चों का एक छोटा समूह जिन पर स्टेरॉयड चिकित्सा का अनुकूल प्रभाव नहीं हो पाता, उनकी पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में किडनी की आगे की जाँच की आवश्यकता होती है जैसे – किडनी की बायोप्सी। उन्हें लीवामिजोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, साइक्लोस्पेरिन, टेक्रोलीमस, माइकोफिनाइलेट आदि वैकल्पिक दवा दी जाती है। स्टेरॉयड के साथ-साथ वैकल्पिक दवा भी दी जाती है। जब स्टेरॉयड की मात्रा कम कर दी जाती है तो ये दवा रेमिषन को बनाये रखने में सहायक होती है।

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।

संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।

जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।


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* निगरानी और जाँच करना :

संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है।

10 आम आदतें, जो किडनी खराब करती हैं:
1. पेशाब आने पर करने न जाना
2. रोज 7-8 गिलास से कम पानी पीना
3. बहुत ज्यादा नमक खाना
4. हाई बीपी के इलाज में लापरवाही बरतना
5. शुगर के इलाज में कोताही करना
6. बहुत ज्यादा मीट खाना
7. ज्यादा मात्रा में पेनकिलर लेना
8. बहुत ज्यादा शराब पीना

9. पर्याप्त आराम न करना
10. सॉफ्ट ड्रिंक्स और सोडा ज्यादा लेना
नोट: किसी को भी दवाओं को लेकर एक्सपेरिमेंट नहीं करना चाहिए। बहुत-सी दवाएं, खासकर आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में लेड और पोटैशियम ज्यादा मात्रा में होता है, जो किडनी के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होता है।

किडनी की बीमारी से बचने के उपाय – 

रोज 8-10 गिलास पानी पीएं। – फल और कच्ची सब्जियां ज्यादा खाएं। – अंगूर खाएं क्योंकि ये किडनी से फालतू यूरिक एसिड निकालते हैं। – मैग्नीशियम किडनी को सही काम करने में मदद करता है, इसलिए ज्यादा मैग्नीशियम वाली चीजें जैसे कि गहरे रंग की सब्जियां खाएं। – खाने में नमक, सोडियम और प्रोटीन की मात्रा घटा दें। – 35 साल के बाद साल में कम-से-कम एक बार ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच जरूर कराएं। – ब्लड प्रेशर या डायबीटीज के लक्षण मिलने पर हर छह महीने में पेशाब और खून की जांच कराएं। – न्यूट्रिशन से भरपूर खाना, रेग्युलर एक्सरसाइज और वजन पर कंट्रोल रखने से भी किडनी की बीमारी की आशंका को काफी कम किया जा सकता है।
किडनी के मरीज खाने में रखें ख्याल किसी शख्स की किडनी कितना फीसदी काम कर रही है, उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए तो किडनी की आगे और खराब होने से रोका जा सकता है :
1. प्रोटीन : 1 ग्राम प्रोटीन/किलो मरीज के वजन के हिसाब से लिया जा सकता है। नॉनवेज खानेवाले 1 अंडा, 30 ग्राम मछली, 30 ग्राम चिकन और वेज लोग 30 ग्राम पनीर, 1 कप दूध, 1/2 कप दही, 30 ग्राम दाल और 30 ग्राम टोफू रोजाना ले सकते हैं।
2. कैलरी : दिन भर में 7-10 सर्विंग कार्बोहाइड्रेट्स की ले सकते हैं। 1 सर्विंग बराबर होती है – 1 स्लाइस ब्रेड, 1/2 कप चावल या 1/2 कप पास्ता।


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3. विटामिन : दिन भर में 2 फल और 1 कप सब्जी लें।
4. सोडियम : एक दिन में 1/4 छोटे चम्मच से ज्यादा नमक न लें। अगर खाने में नमक कम लगे तो नीबू, इलाइची, तुलसी आदि का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करें। पैकेटबंद चीजें जैसे कि सॉस, आचार, चीज़, चिप्स, नमकीन आदि न लें।
5. फॉसफोरस : दूध, दूध से बनी चीजें, मछली, अंडा, मीट, बीन्स, नट्स आदि फॉसफोरस से भरपूर होते हैं इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही लें। डॉक्टर फॉसफोरस बाइंडर्स देते हैं, जिन्हें लेना न भूलें।
6. कैल्शियम : दूध, दही, पनीर, टोफू, फल और सब्जियां उचित मात्रा में लें। ज्यादा कैल्शियम किडनी में पथरी का कारण बन सकता है।
7. पोटैशियम : फल, सब्जियां, दूध, दही, मछली, अंडा, मीट में पोटैशियम काफी होता है। इनकी ज्यादा मात्रा किडनी पर बुरा असर डालती है। इसके लिए केला, संतरा, पपीता, अनार, किशमिश, भिंडी, पालक, टमाटर, मटर न लें। सेब, अंगूर, अनन्नास, तरबूज़, गोभी ,खीरा , मूली, गाजर ले सकते हैं।
8. फैट : खाना बनाने के लिए वेजिटबल या ऑलिव ऑयस का ही इस्तेमाल करें। बटर, घी और तली -भुनी चीजें न लें। फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड दूध ही लें।

9. तरल चीजें : शुरू में जब किडनी थोड़ी ही खराब होती है तब सामान्य मात्रा में तरल चीजें ली जा सकती हैं, पर जब किडनी काम करना कम कर दे तो तरल चीजों की मात्रा का ध्यान रखें। सोडा, जूस, शराब आदि न लें। किडनी की हालत देखते हुए पूरे दिन में 5-7 कप तरल चीजें ले सकते हैं।

10. सही समय पर उचित मात्रा में जितना खाएं, पौष्टिक खाएं।

खाने में इनसे करें परहेज –

 फलों का रस, कोल्ड ड्रिंक्स, चाय-कॉफी, नीबू पानी, नारियल पानी, शर्बत आदि। – सोडा, केक और पेस्ट्री जैसे बेकरी प्रॉडक्ट्स और खट्ट‌ी चीजें। – केला, आम, नीबू, मौसमी, संतरा, आडू, खुमानी आदि। – मूंगफली, बादाम, खजूर, किशमिश और काजू जैसे सूखे मेवे। – चौड़ी सेम, कमलककड़ी, मशरूम, अंकुरित मूंग आदि। – अचार, पापड़, चटनी, केचप, सत्तू, अंकुरित मूंग और चना। – मार्केट के पनीर के सेवन से बचें। बाजार में मिलने वाले पनीर में नींबू, सिरका या टाटरी का इस्तेमाल होता है। इसमें मिलावट की भी गुंजाइश रहती है।

कैसे तैयार करें खाना- 

 वेजिटेबल ऑयल और घी आदि बदल-बदल कर इस्तेमाल करें। – घर पर ही नीबू के बजाय दही से डबल टोंड दूध फाड़कर पनीर बनाएं। – खाना पकाने से पहले दाल को कम-से-कम दो घंटे और सब्जियों को एक घंटे तक गुनगुने पानी में रखें। इससे उनमें पेस्टिसाइड्स का असर कम किया जा सकता है। -महीने में एकाध बार लीचिंग प्रक्रिया अपनाकर घर में छोले और राजमा भी खा सकते हैं, पर इसकी तरी के सेवन से बचें। -नॉनवेज खानेवाले रेड मीट का सेवन नहीं करें। चिकन और मछली भी एक सीमित मात्रा में ही खाएं। -रोजाना कम-से-कम दो अंडों का सफेद हिस्सा खाने से जरूरी मात्रा में प्रोटीन मिलता है।


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शुरुआती लक्षण – 

पैरों और आंखों के नीचे सूजन – चलने पर जल्दी थकान और सांस फूलना – रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना – भूख न लगना और हाजमा ठीक न रहना – खून की कमी से शरीर पीला पड़ना

नोट: इनमें से कुछ या सारे लक्षण दिख सकते हैं।

देर से पता लगती है बीमारी

पहली स्टेज:

 पेशाब में कुछ गड़बड़ी पता चलती है लेकिन क्रिएटनिन और ईजीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट) सामान्य होता है। ईजीएफआर से पता चलता है कि किडनी कितना फिल्टर कर पा रही है।

दूसरी स्टेज:

 ईजीएफआर 90-60 के बीच में होता है लेकिन क्रिएटनिन सामान्य ही रहता है। इस स्टेज में भी पेशाब की जांच में प्रोटीन ज्यादा होने के संकेत मिलने लगते हैं। शुगर या हाई बीपी रहने लगता है।

तीसरी स्टेज: 

ईजीएफआर 60-30 के बीच में होने लगता है, वहीं क्रिएटनिन भी बढ़ने लगता है। इसी स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण सामने आने लगते हैं। अनीमिया हो सकता है, ब्लड टेस्ट में यूरिया ज्यादा आ सकता है। शरीर में खुजली होती है। यहां मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना लाइफस्टाइल सुधारना चाहिए।

चौथी स्टेज: 

ईजीएफआर 30-15 के बीच होता है और क्रिएटनिन भी 2-4 के बीच होने लगता है। यह वह स्टेज है, जब मरीज को अपनी डायट और लाइफस्टाइल में जबरदस्त सुधार लाना चाहिए नहीं तो डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की स्टेज जल्दी आ सकती है। इसमें मरीज जल्दी थकने लगता है। शरीर में कहीं सूजन आ सकती है।

पांचवीं स्टेज :

 ईजीएफआर 15 से कम हो जाता है और क्रिएटनिन 4-5 या उससे ज्यादा हो जाता है। फिर मरीज के लिए डायैलसिस या ट्रांसप्लांट जरूरी हो जाता है।

विशेष- शुरुआती स्टेज में किडनी की बीमारी को पकड़ना बहुत मुश्किल है क्योंकि दोनों किडनी के करीब 60 फीसदी खराब होने के बाद ही खून मे क्रिएटनिन बढ़ना शुरू होता है।

क्या है इलाज

इस बीमारी के इलाज को मेडिकल भाषा में रीनल रिप्लेसमेंट थेरपी (RRT) कहते हैं। किडनी खराब होने पर फाइनल इलाज तो ट्रांसप्लांट ही है, लेकिन इसके लिए किडनी डोनर मिलना मुश्किल है, इसलिए इसका टेंपररी हल डायलिसिस है। यह लगातार चलनेवाले प्रोसेस है और काफी महंगा है।

क्या है डायलिसिस

खून को साफ करने और इसमें बढ़ रहे जहरीले पदार्थों को मशीन के जरिए बाहर निकालना ही डायैलसिस है। डायैलसिस दो तरह की होती है:


मोतियाबिंद  और कमजोर नजर के आयुर्वेदिक उपचार


1. हीमोडायलिसिस : 

सिर्फ अस्पतालों में ही होती है। तय मानकों के तहत अस्पताल में किसी मरीज की हीमोडायैलसिस में चार घंटे लगते हैं और हफ्ते में कम-से-कम दो बार इसे कराना चाहिए। इसे बढ़ाने या घटाने का फैसला डॉक्टर ही कर सकते हैं।

2. पेरीटोनियल :

 पानी से डायलिसिस घर पर की जा सकती है। इसके लिए पेट में सर्जरी करके वॉल्व जैसी चीज डाली जाती है। इसका पानी भी अलग से आता है। डॉक्टर घर में किसी को करना सिखा देते हैं। यह थोड़ी कम खर्चीली है लेकिन इसमें सफाई का बहुत ज्यादा ध्यान रखना होता है, वरना इन्फेक्शन हो सकता है।

कैसे होती है हीमोडायलिसिस

 इमरजेंसी में मरीज की गर्दन के निचले हिस्से में कैथेटर डालकर या फिर जांघ की ब्लड वेसल्स में फेमोरल प्रक्रिया से डायैलसिस की जाती है। रेग्युलर डायलिसिस के लिए मरीज की बाजू में सर्जरी करके ‘एवी फिस्टुला’ बनाया जाता है ताकि बगैर किसी परेशानी के डायलिसिस की जा सके। एवी फिस्टुला में आर्टरी को नाड़ी से जोड़ा जाता है। इस तरह से बनाए गए फिस्टुला को काम करने लायक होने में 8 हफ्ते लगते हैं। फिस्टुला डायलिसिस कराने वाले मरीजों की लाइफलाइन है, इसलिए इसकी हिफाजत बहुत जरूरी है। ध्यान रखें कि जिस हाथ में फिस्टुला बना है, उससे न तो बीपी नापा जाए और न ही जांच के लिए खून निकाला जाए। इस हाथ में इंजेक्शन भी नहीं लगवाना चाहिए। यह हाथ न तो दबना चाहिए और न ही इससे भारी सामान उठाना चाहिए। अगर एवी फिस्टुला सही समय पर बन जाए तो मरीज के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।


*गठिया रोग के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार*


   किडनी की समस्या से जूझ रहे मरीज की हफ्ते में 8 से 12 घंटे डायैलसिस होनी चाहिए। चूंकि आमतौर पर एक बार में चार घंटे की डायैलसिस होती है, इसलिए मरीज की सेहत को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर उसे हफ्ते में दो बार या हर तीसरे/ दूसरे दिन डालसिसिस कराने की सलाह देते हैं। मरीज को अपनी मर्जी से दो डायलिसिस के बीच का फर्क नहीं बढ़ाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर कभी-कभी बड़ी परेशानी पैदा हो जाती है और मरीज आईसीयू तक में पहुंच जाता है।

खून की नियमित जांच जरूरी

* डायलिसिस कराने वाले मरीजों को महीने में कम-से-कम एक बार खून की जांच (KFT) करानी चाहिए। इस जांच से मरीज के शरीर में हीमोग्लोबीन, ब्लड यूरिया, क्रिएटनिन, पोटैशियम, फॉस्फोरस और सोडियम की मात्रा का पता लगता है।

*हालात के अनुसार समय-समय पर डॉक्टर मरीज के खून की जांच के जरिए शरीर में पीटीएच, आयरन और बी-12 आदि की भी जांच करते हैं। – हर डायैलसिस यूनिट अपने मरीजों से हर छह महीने पर एचआईवी, हैपेटाइटिस बी और सी के लिए खून की जांच कराने का अनुरोध करती है।

* अगर किसी मरीज की रिपोर्ट से उसके एचआईवी, हैपेटाइटिस बी या सी से प्रभावित होने का संकेत मिलता है तो उसकी डायैलसिस में खास सावधानी बरती जाती है। ऐसे मरीज की डायैलसिस में हर बार नए डायैलजर का इस्तेमाल होता है ताकि कोई दूसरा मरीज इस इन्फेक्शन की चपेट में न आ सके।

बरतें ये सावधानियां 
*डायलिसिस कराने वालों को लिक्विड चीजें कम लेनी चाहिए। किडनी खराब होने पर खून की सफाई के प्रॉसेस में रुकावट आती है और आमतौर पर मरीज को पेशाब भी कम आने लगता है, इसलिए उन्हें सीमित मात्रा में लिक्विड चीजें लेनी चाहिए।
*लिक्विड चीजों में पानी के अलावा दूध, दही, चाय, कॉफी, आइसक्रीम, बर्फ और दाल-सब्जियों की तरी भी शामिल हैं। यही नहीं, रोटी, चावल और ब्रेड आदि में भी पानी होता है।


धनिया के  चोक़ाने वाले फ़ायदे जानकर हैरान रह जायेंगे


*लिक्विड पर कंट्रोल रखने से दो डायलिसिस के बीच में मरीज का वजन (जिसे वेट गेन या वॉटर रिटेंशन भी कहते हैं) अधिक नहीं बढ़ता। दो डायलिसिस के बीच में ज्यादा वजन बढ़ने से डायलिसिस का प्रॉसेस पूरा होने पर कई बार कमजोरी या चक्कर आने की शिकायत भी होने लगती है।
* किडनी के मरीज को डायटीशियन से भी जरूर मिलना चाहिए क्योंकि इस बीमारी में खानपान पर कंट्रोल बहुत जरूरी है।
* किडनी के जो मरीज डायलसिस पर नहीं हैं, उन्हें कम प्रोटीन और डायलसिस कराने वाले मरीजों को ज्यादा प्रोटीन की जरूरत होती है। लेकिन खानपान की पूरी जानकारी डायट एक्सपर्ट ही दे सकते हैं।
*डायलिसिस कराने वाले रोगी को  कोई भी दवा लेने से पहले अपने किडनी एक्सपर्ट (नेफ्रॉलजिस्ट) से सलाह जरूरी है। नोट: किडनी की बीमारी सुनकर जिंदगी खत्म होने की बात सोचना गलत है क्योंकि अगर खानपान और रुटीन में सावधानी बरती जाए तो डायलसिस कराते हुए भी लंबी जिंदगी का आनंद लिया जा सकता है। मरीज को घर-परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों का पूरा साथ मिलना जरूरी है ताकि वह उलट परिस्थितियों का ज्यादा संयम के साथ सामना कर सके।


नींबू के रस से करें रोग निवारण


लिक्विड का सेवन ऐसे कम करें 
डायलिसिस कराने वाला रोगी  नीचे लिखे तरीकों से लिक्विड का सेवन कम कर सकता है:
*गर्मियों में 500 एमएल की कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी भरके उसे फ्रीजर में रख लें। यह बर्फ बन जाएगा और फिर इसका धीरे-धीरे सेवन करें।
*फ्रिज में बर्फ जमा लें और प्यास लगने पर एक टुकडा मुंह में रखकर घुमाएं और फिर उसे फेंक दें।
* गर्मियों में रुमाल भिगोकर गर्दन पर रखने से भी प्यास पर काबू पाया जा सकता है।
*घर में छोटा कप रखें और उसी में पानी लेकर पीएं।
*खाना खाते समय दाल और सब्जियों की तरी का सेवन कम-से-कम करने की कोशिश करें।

आयुर्वेद
बीमारी की वजह के आधार पर ही जरूरी दवा खाने की सलाह दी जाती है:
*चूंकि किडनी का काम शरीर में खून की सफाई करना और जहरीली चीजों को बाहर निकालना होता है। इलाज के दौरान मरीज के खानपान को सुधारने के साथ ही उसके बीपी और शुगर को कंट्रोल में रखने पर खास ध्यान दिया जाता है।
*वरुण, पुनर्नवा, अर्जुन, वसा, कातुकी, शतावरी, निशोध, कांचनार, बाला, नागरमोथा, भबमिआमलकी, सारिवा, अश्वगंधा और पंचरत्नमूल आदि दवाओं का इस्तेमाल किडनी के इलाज में किया जाता है।
* किडनी की बीमारी का लगातार इलाज जरूरी है और यह ताउम्र चलता है। किडनी की बीमारी का इलाज से ज्यादा मैनेजमेंट होता है।


सिर्फ दो हफ्ते मे पेट की फेट गायब 


किडनी रोग मे खाने योग्य –

सब्जियां :- यदि आपको किडनी की बीमारी है तो आप घिया , तोरी , टिंडा , परवल , धनिया ,सहिजन इत्यादि हरी सब्जियों का सेवन करे, हमेशा ध्यान रखे की तरीदार सब्जी ही प्रयोग करे , सेम की फली गाजर का जूस , कच्चा पपीता , कच्चा केला , पेठा और ककड़ी आदि सब्जियों का खाने में प्रयोग करे |

पेय पदार्थ :- नारियल का पानी , जों का पानी ,पत्थरचट्टे का पत्ता , गेहूं के जवारे , बकरी का दूध , पानी को उबालकर पीयें , गाय के दूध की लस्सी , और दही लेकिन इनका प्रयोग कम मात्रा में करें |

फल :- सेब , अमरुद , पक्का हुआ आम , नागकेशर पुनर्नवा और सोंफ आदि फलों का सेवन करें|

जिन चीजों से परहेज करना है :-

त्यागें:- आलू , पालक , चौलाई का साग , गोभी , मशरूम , बैंगन , अदरक , टमाटर , हरी मिर्च ,मटर आदि | इसके आलावा लाल मिर्च , खट्टी चीजें , जरूरत से ज्यादा व्यायाम करना , दही का उपयोग इस बीमारी में नहीं करना चाहिए | दालों में हमे चना , राजमा , काजू , और उड़द की दाल ,का इस्तेमाल करना हमारे शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है |
नोट :- इस रोग से पीड़ित मनुष्य को कभी – भी शराब और मांस – मछली का प्रयोग तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए | नमक की मात्रा भी कम दें |

होम्यॉपथी 
लक्षणों के आधार पर कॉलि-कार्ब 200, एपिस-मेल-30, एसिड बेंजोक, टेरीबिंथ,बर्बेरिस वल्गरीस, लेसीथिन, फेरम मेट और चाइना जैसी दवाएं दी जाती हैं। थकान और कमजोरी दूर करने के लिए अल्फाल्फा टॉनिक भी दिया जाता है।
नोट: होम्यॉपथी डायैलसिस बंद कराने में सक्षम नहीं है लेकिन यह ऐसे मरीजों की सहायक जरूर है। ऐलोपैथी दवाओं के साथ ही होम्योपैथी दवाओं के सेवन से मरीज ज्यादा सेहतमंद रह सकता है।


कलमी शोरा (पोटाशियम नाईटेरेट) के गुण उपयोग 


नेचरॉपथी 
* किडनी की क्षमता बढ़ाने के लिए नेचरोपैथी में मरीज को सलाद, फल आदि कुदरती चीजें लेने को कहा जाता है। इससे किडनी की सफाई शुरू होती है और उसे आराम भी मिलता है।
* किडनी की जगह पर सूती कपड़े की पट्टी को ताजे पानी में भिगोकर रोजाना आधे घंटे लगाते हैं। ऐसा करने से किडनी की तरफ के शरीर का तापमान कम होता है और उस ओर खून का दौरा बढ़ता है।
* इसी तरह किडनी की जगह पर गर्म और ठंडे पानी से सिकाई करते हैं। इसे भी रोजाना आधे घंटे के लिए कर सकते हैं। इससे किडनी में खून का दौरा बढ़ता है।

* धूप स्नान के जरिए सुबह-सुबह किडनी पर सूरज की सीधी किरणों से इलाज किया जाता है और किडनी की सफाई होती है।
*मरीज को एक टब में बिठाकर उसकी नाभि तक पानी रखा जाता है। यह क्रिया आधे घंटे तक की जाती है। कटिस्नान से भी किडनी की ओर खून का दौरा बढ़ता है।
योग
*रोजाना कम-से-कम 20 मिनट तक अनुलोम-विलोम करना चाहिए।
* गलत लाइफस्टाइल और बुरी आदतों को छोड़ दें तो किडनी के साथ-साथ दूसरी बीमारियों से भी बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ –

इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम –     राजेन्द्र द्विवेदी  

पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 

इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट –

जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 

ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl

S.Creatinine –  10.9mg/dl

हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 

जांच रिपोर्ट  दिनांक – 14/9/2017 

ब्लड यूरिया –     31mg/dl

S.Creatinine  1.6mg/dl

जांच रिपोर्ट –

 दिनांक -22/9/2017

 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 

blood urea – 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl

Conclusion- All  investigations normal 


 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम – Awdhesh 

निवासी – कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट


दिनांक – 26/4/2016


Urea- 55.14   mg/dl


creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल –




creatinine 1.34 mg/dl


urea 22  mg/dl

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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार // Home remedies for arthritis

  संधिवात रोग में शरीर के जोडों और अन्य भागों में सूजन आ जाती है और रोगी दर्द से परेशान रहता है। चलने फ़िरने में तकलीफ़ होती है।यह रोग शरीर के तंतुओं में विकार पैदा करता है,प्रतिरक्छा प्रणाली कमजोर हो जाती है,जोड शोथ युक्त हो जाते हैं,हिलने डुलने में कष्ट होता है।कलाई,घुटनों और ऊंगली ,अंगूठे में संधिवात का रोग ज्यादा देखने में आता है। कभी-कभी बुखार आ जाता है।भूख नहीं लगना भी इस रोग का लक्षण है। समय पर ईलाज नहीं करने पर आंखों,फ़ेफ़डों,हृदय व अन्य अंग दुष्प्रभावित होने लगते हैं।

संधिवात के कारण

१)आनुवांशिक कारण
२)खान-पान की असावधानियां
३) जोडों पर ज्यादा शारीरिक दवाब पडना
४) जोडों का कम या जरूरत से अधिक उपयोग करना
५) स्नायविक तंतुओं में विकार आ जाना और मेटाबोलिस्म में व्यवधान पड जाना।
६) सर्द वातावरण में शरीर रखने का कुप्रभाव
७)बुढापा और हार्मोन का असुंतुलन

संधिवात रोगी क्या करें और क्या न करें-

१) सबसे महत्वपूर्ण सलाह यह है कि रोगी २४ घंटे में मौसम के अनुसार ४ से ६ लिटर पानी पीने की आदत डालें। शरीर के जोडों में यूरिक एसीड जमा हो जाता है और इसी से संधिवात रोग जन्म लेता है। ज्यादा पानी पीने से ज्यादा पेशाब होगा और यूरिक एसीड बाहर निकलता रहेगा।

२) फ़ल और हरी सब्जीयां अपने आहार में प्रचुरता से शामिल करें।इनमें भरपूर एन्टीओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो हमारे इम्युन सिस्टम को ताकतवर बनाते हैं।रोजाना ७५० ग्राम फ़ल या सब्जियां या दोनों मिलाकर उपयोग करते रहें।इनका रस निकालकर पियेंगे तो भी वही लाभ प्राप्त होगा।

३)ताजा गाजर का रस और नींबू का रस बराबर मात्रा में मिश्रण कर १५ मिलि प्रतिदिन लें।

 

४) ककडी का रस पीना भी संधिवात में लाभकारी है।

५) संधिवात रोगी को चाहिये कि सर्दी के मौसम में धूप में बैठे।

७) चाय,काफ़ी,मांस से संधिवात रोग उग्र होता है इसलिये जल्दी ठीक होना हो तो इन चीजों का इस्तेमाल न करें।

६) शकर का उपयोग हानिकारक होता है।

८) तला हुआ भोजन,नमक,शकर तेज मिर्च-मसाले,शराब छोडेंगे तो जल्दी ठीक होने के आसार बनेगे

 

९) संधिवात रोगी के लिये यह जरूरी है कि हफ़्ते में दो दिन का उपवास करें।

१०) काड लिवर आईल ५ मिलि की मात्रा में सुबह शाम लेने से संधिवात में फ़ोरन लाभ मिलता है।

११) पर्याप्त मात्रा में केल्शियम और विटामिन डी की खुराकें लेते रहें। ये विटामिन भोजन के माध्यम से लेंगे तो ज्यादा बेहतर रहेगा।

१२) तीन नींबू का रस और ४० ग्राम एप्सम साल्ट आधा लिटर गरम पानी में मिश्रित कर बोतल में भर लें। दवा तैयार है। ५ मिलि दवा सुबह शाम पीयें। यह नुस्खा बेहद कारगर है।

१३) मैने साईटिका रोग में आलू का रस पीने का ईलाज बताया है। संधिवात में भी आलू का रस अशातीत लाभकारी है। २०० मिलि रस रोज पीना चाहिये।

१४) ज्यादा सीढियां चढना हानिकारक है।

१५)अपने काम और विश्राम के बीच संतुलन बनाये रखना जरूरी है।

१६) अदरक का रस पीना संधिवात के दर्द में शीघ्र राहत पहुंचाता है।

१७) अलसी के बीज मिक्सर में चलाकर पावडर बनालें। २० ग्राम सुबह और २० ग्राम शाम को पानीके साथ लें। इसमे ओमेगा फ़ेट्टी एसीड होता है जो इस रोग में अत्यंत हितकर माना गया है।इससे कब्ज का भी निवारण हो जाता है।

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हर्बल चिकित्सा के अनमोल  रत्न-


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र – बाधा  का  अचूक  इलाज *किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

विशिष्ट परामर्श-  

    संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी – बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| हर्बलऔषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|








 

 

गुर्दे के रोगों का आयुर्वेदिक घरेलू पदार्थों से इलाज

किडनी शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। किडनी रक्त में मौजूद पानी और व्यर्थ पदार्थो को अलग करने का काम करता है। इसके अलावा शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है। इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो शरीर की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है।
लगातार दूषित पदार्थ ,दूषित जल पीने और नेफ़्रोंस के टूटने से किडनी के रोग उत्पन्न होते|इसके कारण किडनी शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। बदलती लाइफस्टाइल व काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों में जंकफूड व फास्ट फूड का सेवन ज्यादा करने लगे हैं। इसी वजह से लोगों की खाने की प्लेट से स्वस्थ व पौष्टिक आहार गायब होते जा रहें हैं। किडनी के रोगों को दूर करने के लिए कुछ प्राकृतिक उपायों की मदद लेना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। ऐसे ही कुछ खास उपाय लेकर आए हैं हम आपके लिए।

विटामिन

कुछ खास तरह के विटामिन के सेवन से किडनी को स्वस्थ व मजबूत बनाया जा सकता है। यूं तो विटामिन पूरे शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन कुछ खास तरह के विटामिन का सेवन किडनी को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता है। विटामिन डी के सेवन से किडनी के रोगों के लक्षणों को कम किया जा सकता है। अगर आप हर रोज विटामिन बी6 का सेवन करें तो किडनी स्टोन की समस्या से बच सकते हैं या आप इस समस्या से ग्रस्त हैं तो बिना किसी डर इस विटामिन का सेवन कर सकते हैं। कुछ ही दिनों स्टोन की समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। इसके अलावा विटामिन सी के सेवन से किडनी को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है।

 

बेकिंग सोडा

ब्रिटिश शोधर्कर्ताओं के मुताबिक किडनी के रोगों से बचने के लिए सोडियम बाइकार्बोनेट का सेवन फायदेमंद होता है। इसके सेवन से किडनी के रोगों की गति को कम किया जा सकता है। बेकिंग सोडा की मदद से रक्त में होने वाली एसिडिटी की समस्या खत्म हो जाती है जो कि किडनी की समस्याओं के मुख्य कारणों में से एक है।

 

एप्पल साइडर विनेगर

इसका प्रयोग कई शारीरिक जरूरतों के लिए किया जाता है। इसके अलावा किडनी संबंधी समस्याओं के बारे में भी काफी कारगर साबित होता है। इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरियल तत्व शरीर को बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाते हैं जिसमें किडनी भी शामिल है। एप्पल साइडर विनेगर प्रयोग से किडनी में मौजूद स्टोन धीरे-धीरे अपनेआप खत्म हो जाता है। इसमें मूत्रवर्धक तत्व होते हैं जो किडनी से व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालते हैं और किडनी को स्वस्थ रखते हैं।

 

सब्जियों का रस

किडनी की समस्या होने पर गाजर, खीरा, पत्तागोभी तथा लौकी के रस पीना चाहिए। इससे किडनी के रोगों से उबरने में मदद मिलती है और किडनी स्वस्थ रहती है। इसके अलावा तरबूज तथा आलू का रस भी गुर्दे के रोग को ठीक करने के लिए सही होता है इसलिए पीड़ित रोगी को इसके रस का सेवन सुबह शाम करना चाहिए।


पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 


मुनक्का का पानी

व्यक्ति को रात के समय में सोते वक्त कुछ मुनक्का को पानी में भिगोने के लिए रखना चाहिए तथा सुबह के समय में मुनक्का पानी से निकाल कर, इस पानी को पीना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक लगातार करने से गुर्दे का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

 

पानी ज्यादा पीएं

गुर्दे के रोगों से बचने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें। इससे किडनी में मौजूद व्यर्थ पदार्थ यूरीन के जरिए बाहर निकल जाएगें और आप किडनी के रोगों से बचे रहेंगे। चाहें तों पानी में नींबू के रस को निचोड़ कर भी पी सकते हैं इससे शरीर को विटामिन सी व पानी दोनों साथ मिलेगा।

 

नमक की मात्रा कम लें

किडनी की समस्या से ग्रस्त लोगों को अपने आहार पर खास ध्यान देना चाहिए। खाने में नमक व प्रोटीन की मात्रा कम रखनी चाहिए जिससे किडनी पर कम दबाव पड़ता है। इसके अलावा फासफोरस और पौटेशियम युक्त आहार से भी दूर ही रहना चाहिए।

परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ –

 

 

 

इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

 

रोगी का नाम –     राजेन्द्र द्विवेदी  

पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 

इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट –

जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 

ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl

S.Creatinine –  10.9mg/dl

 

हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 

जांच रिपोर्ट  दिनांक – 14/9/2017 

ब्लड यूरिया –     31mg/dl

S.Creatinine  1.6mg/dl

जांच रिपोर्ट –

 दिनांक -22/9/2017

 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 

blood urea – 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl

Conclusion- All  investigations normal 




 केस रिपोर्ट 2-


रोगी का नाम – Awdhesh 


निवासी – कानपुर 


ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट







दिनांक – 26/4/2016


Urea- 55.14   mg/dl


creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल –




creatinine 1.34 
mg/dl


urea 22  mg/dl

 

 

जीरा घटाता है वजन //Cumin reduces weight


जीरा खाने को बेहतरीन स्वाद और खुशबू देने वाला मसाला है| यह केवल एक मसाला मात्र नहीं है बल्कि इसके अन्य कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं| आयुर्वेद में कई रोगों में में इसका उपयोग किया जाता है| भारत ,मेक्सिको और अमेरिका में जीरे का बहुतायत से उपयोग किया जाता है|

मैं अब जीरे से वजन कैसे कम किया जा सकता है ,इस पर लिखना चाहूँगा| एक ताजा मेडिकल स्टडी में पता चला है कि जीरा पावडर मोटापा कम करने में मदद गार है| बात ये है कि जीरा से शरीर में वसा का अवशोषण कम होता है| फल स्वरूप मोटापा घटाने में सहायक है|

थकान दूर करने के उपाय

   

एक बड़ा चम्मच जीरा एक गिलास पानी में डालकर रात भर के लिए रख दें| सुबह इसे उबाल लें और गरम गरम चाय की तरह पियें| बचा हुआ जीरा भी चबा कर खालें|

इसके नियमित इस्तेमाल से शरीर के किसी भी कौने की चर्बी घुलकर बाहर निकल जाती है| यह प्रक्रिया करने के बाद एक घंटे तक कुछ ना खाएँ|दूसरी विधि ये है कि भूनी हुई हींग ,काला नमक और जीरा बराबर  मात्रा में लेकर  चूर्ण बनालें|  मात्रा १ से ३ ग्राम, दही के साथ दिन में दो बार सेवन करने से  शरीर की अनावश्यक चर्बी  दूर  होती है|  साथ ही रक्त परिसंचरण  भी सुधरता है और शरीर का कोलेस्ट्रोल भी घटता  है|

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

यह नुस्खा लेने के बाद रात्री में कोई दूसरी भोजन सामग्री ना खाएं| धूम्र पान करने वाले और मसाला गुटखा खाने वालों पर इस नुस्खे का प्रभाव न के बराबर होता है| इसलिए दवा से लाभ प्राप्त करने के लिए धूम्र पान ,गुटखा, तम्बाखू त्याग दें| | दवा शाम के भोजन के दो घंटे बाद लेना कर्तव्य है| जीरा हमारे पाचन तंत्र को चुस्त दुरुस्त रखते हुए शरीर को उर्जावान बनाता है| जीरा हमारे इम्यून सिस्टम को ताकत देता है| फेट बर्न की गति तेज करता है| पेट की लगभग सभी समस्याओं में जीरे का प्रयोग हितकारी होता है| जीरे से शरीर की शोधन प्रक्रिया बलवान होती है |यह न केवल मोटापा घटाता है बल्कि कई अन्य बीमारियों में भी हितकारी है|

 

सब्जियों से करें डायबिटीज़ कंट्रोल // Just vegetables to control diabetes

मधुमेह एक ऐसा भयंकर रोग हैं जिसमे कुछ भी खाना पीना हो तो बहुत सोचना पड़ता हैं के क्या खाये और क्या न खाये ऐसे में कुछ ऐसी सब्जियां हैं जिनका खानपान मधुमेह के हिसाब से सही तो हैं ही बल्कि इनके सेवन से मधुमेह के रोग को कंट्रोल करने में बहुत मदद मिलती हैं अपने भोजन में इन्हे जरूर शामिल करें |

आइये जाने इन सब्जियों के बारे में जो मधुमेह का नियंत्रण  करती हैं

हरी फली-

आपने ग्रीन बींस की सब्जी बनाकर खाई होगी। यह स्वादिष्ट तो होती है साथ ही गुणकारी भी होती है। इसमें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, विटामिन ए, फोलेट और मैग्नीशियम पाए जाते हैं। आपको बता दें ग्रीन बींस एक ऐसी सब्जी है जिसका आप यदि नियमित रूप से सेवन करते हैं तो आपका वजन घट सकता है, क्योंकि इसमें फाइबर होता है जो वजन को घटाने में सहायक है। यह इम्यून सिस्टम को बेहतर करता है साथ ही हड्डियों को भी मजबूती प्रदान करता है। डायबिटीज के रोगियों के लिए आदर्श सब्जी माने जाने वाली हरी फली दिल से जुड़ी बीमारियों के लिए फायदेमंद है और पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखता है।

करेला-

करेला अग्नाशय को उत्तेजित कर इंसुलिन के स्त्राव को बढ़ाता हैं करेले में इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में होती हैं यह इंसुलिन मूत्र एवं रक्त दोनों की ही शर्करा को नियंत्रित करने में समर्थ हैं मधुमेह  में करेले का जूस और सब्जी दोनों ही लाभदायक हैं और इसका चूर्ण भी  हितकारी है|


किडनी फेल रोग का अचूक इलाज* 


सेम –

सेम में इंसुलिन पाया जाता हैं और इसमें रेशा अर्थार्थ फाइबर भी अधिक होता हैं जो मधुमेह में बहुत लाभदायक हैं मधुमेह के रोगी को सेम की सब्जी और कच्ची सेम का जूस पीना चाहिए ये जूस नित्य एक-एक कप दिन मे दो बार पीना चाहिए

गाजर-

औषधीय गुणों से भरपूर गाजर का सेवन बहुत ही लाभकारी है। चिकित्सकों के मुताबिक इसे कच्चा खाने या इसका जूस पीने से न केवल आपकी आंखों को फायदा होता है बल्कि पेशाब और कफ संबंधी समस्या के लिए भी यह उपयोगी है। मधुमेह के मरीजों को यकीनी तौर  पर गाजर का सेवन करना चाहिए। जो लोग रोजाना गाजर खाते हैं तो उनका इंसुलिन नियंत्रित रहती है। गाजर एक वीर्य वर्धक सब्जी है और इसे कच्चा तथा उबालकर सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।

सिर्फ सब्जियों से डायबिटीज़ कंट्रोल  करें –

शलगम की सब्जी भी मधुमेह में बहुत लाभदायक हैं इसको भी मधुमेह के रोगी को अपने भोजन में जगह देनी चाहिए


गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज



पत्ता गोभी-

आज खुद को स्वस्थ्य रखने के लिए लोग हरी सब्जियों का अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा शामिल कर रहे हैं। पत्ता गोभी उनमें से एक है। अधिकांश घरों में सेवन किया जाने वाला पत्ता गोभी स्वास्थ्य के लिए एक गुणकारी सब्जी है। इसे लोग सब्जी और पकौड़े के रूप में खाते हैं। इसके अलावा इसका इस्तेमाल सलाद के रूप में भी किया जाता है। फायबर, बिटा केरोटिन, विटामिंस बी1, बी6, के, ई, सी से भरपूर पत्ता गोभी न केवल त्वचा और बालों के लिए बहुत ही उपयोगी है बल्कि इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स डायबिटीज में दवा की तरह काम करते हैं।

कद्दू –

कद्दू में विटामिन सी ,आयरन और वसा ,एंटी आक्सिडेंट और फॉलिक एसिड भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं कद्दू का सेवन करने से मधुमेह के रोगियों को बहुत फायदा होता हैं और इस रोग की रोकथाम करने में बहुत मदद मिलती हैं

टमाटर- 

मधुमेह में टमाटर बहुत ही लाभदायक हैं टमाटर की खटाई शरीर में शर्करा की मात्रा को कम करती हैं मूत्र में शक़्कर जाना धीरे-धीरे बंद हो जाती हैं

ब्रोकोली-

ब्रोकोली एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर की एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्रोत है जिसे कैंसर के रोगियों के लिए सही माना गया है। यह हरी सब्जी ब्रेसिक्को फेमिली की है, जिसमें पत्तागोभी और गोभी भी शामिल होती है। आयरन, प्रोटीन, कैल्शिभयम, कार्बोहाइड्रेट, क्रोमियम, विटामिन ए और सी से भरपूर ब्रोकोली मधुमेह के रोगियों के लिए भी सही माना जाता है। यह न केवल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर सकता है बल्की रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है। इसके साथ ही यह वजन को भी कम करता है। इसलिए अपने डाइट में ब्रोकोली को शामिल करें।


गठिया रोग के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार


खीरा-

कार्बोहाइड्रेट, वसा, आयरन, कैल्शियम और फास्फोरस से भरपूर खीरा पीलिया, प्यास, कब्ज की समस्या, ज्वर, शरीर की जलन, गर्मी के सारे दोष, चर्म रोग में लाभदायक है। पौष्टिक और शक्तिवर्धक होने की वजह से खीरा मस्तिष्क के लिए गुणकारी है। इसके अलावा जो लोग मधुमेह की बीमारी से पीड़ित है उन्हें में भी खीरा खाना चाहिए।

लौकी-

मधुमेह में लौकी बहुत ही लाभ करती हैं सब्जी सलाद के रूप में कच्ची लौकी खा सकते हैं सुबह खली पेट लौकी का रस पीना मधुमेह में बहुत लाभदायक हैं लौकी के रस में थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर पिए|


 

हर्बल इलाज के दोहे //Dohe of herbal remedy

* शहद आंवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम, 

बीस ग्राम घी साथ में, यौवन स्थिर काम..


*दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय, 

होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय..

*ठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल, 

नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल..


*बहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल, 

यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल..

*अजवाइन को पीसिये , गाढ़ा लेप लगाय, 

चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय..

* अजवाइन को पीस लें, नीबू संग मिलाय, 

फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय..

पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम..

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*अदरक का रस लीजिए. मधु लेवें समभाग, 

नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग..

*रोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर

बेहतर लीवर आपका, टी० बी० भी हो दूर..

*गाजर रस संग आँवला, बीस औ चालिस ग्राम, 

रक्तचाप हिरदय सही, पायें सब आराम..

*

*चिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय, 

चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय..

*लाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह,

जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह..

*प्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह , 

जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह..

*सात पत्र लें नीम के, खाली पेट चबाय, 

दूर करे मधुमेह को, सब कुछ मन को भाय..

*सात फूल ले लीजिए, सुन्दर सदाबहार, 

दूर करे मधुमेह को, जीवन में हो प्यार..

*तुलसीदल दस लीजिए, उठकर प्रातःकाल, 

सेहत सुधरे आपकी, तन-मन मालामाल..

* थोड़ा सा गुड़ लीजिए,दूर रहें सब रोग, 

अधिक कभी मत खाइए, चाहे मोहनभोग.



बवासीर  के  रामबाण  उपचार 

 

*अजवाइन और हींग लें,लहसुन तेल पकाय, 

मालिश जोड़ों की करें, दर्द दूर हो जाय..

*ऐलोवेरा-आँवला, करे खून में वृद्धि,

उदर व्याधियाँ दूर हों, जीवन में हो सिद्धि..

*दस्त अगर आने लगें, चिंतित दीखे माथ,

दालचीनि का पाउडर, लें पानी के साथ..

* मुँह में बदबू हो अगर, दालचीनि मुख डाल,

बने सुगन्धित मुख, महक, दूर होय तत्काल..

*कंचन काया को कभी, पित्त अगर दे कष्ट,

घृतकुमारि संग आँवला, करे उसे भी नष्ट..

*बीस मिली रस आँवला, पांच ग्राम मधु संग,

सुबह शाम में चाटिये, बढ़े ज्योति सब दंग..

मोतियाबिंद के  घरेलू प्राकृतिक उपचार 

*बीस मिली रस आँवला, हल्दी हो एक ग्राम,

सर्दी कफ तकलीफ में, फ़ौरन हो आराम..

*नीबू बेसन जल शहद , मिश्रित लेप लगाय,

चेहरा सुन्दर तब बने, बेहतर यही उपाय..

*मधु का सेवन जो करे, सुख पावेगा सोय,

कंठ सुरीला साथ में , वाणी मधुरिम होय.

*पीता थोड़ी छाछ जो, भोजन करके रोज,

नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर हो ओज..

* ठण्ड अगर लग जाय जो नहीं बने कुछ काम,

नियमित पी लें गुनगुना, पानी दे आराम..

*कफ से पीड़ित हो अगर, खाँसी बहुत सताय,

अजवाइन की भाप लें, कफ तब बाहर आय..

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

*अजवाइन लें छाछ संग, मात्रा पाँच गिराम,

कीट पेट के नष्ट हों, जल्दी हो आराम..

*छाछ हींग सेंधा नमक, दूर करे सब रोग,

जीरा उसमें डालकर, पियें सदा यह भोग..।